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Tuesday, 21 February 2023

छोड़ दिया लिखना मैंने

छोड़ दिया लिखना मैंने

मैंने लिखना छोड़ दिया है
क्योंकि मैं...
किताबों में लिखे चेहरे
और चेहरे पर लिखी किताब
पढ़ना चाहता हूँ
इसलिये मैंने लिखना छोड़ दिया है

मैंने कहना छोड़ दिया है
क्योंकि मैं..
तुम्हारी पीड़ा, सुख-दुःख
तुम्हारी अनुभूतियाँ, 
जिन्दगी के कड़वे, खट्टे-मीठे 
सच सुनना चाहता हूँ
इसलिये मैंने कहना छोड़ दिया है

मैंने देखना छोड़ दिया है
अब मुझे महलों दुमहलों की 
खिड़कियाँ, मेहराबें और कंगूरे में
दम्भ ही दम्भ नजर आता है।
मुझे एक गहरी खाई दिखाई पड़ती है..
बड़ी मंजिलों वाले घरों और
पसीने से लथपथ इन मजूरों की
बरसाती से ढँकी वे झुग्गियों में  
इन निचली बस्तियाँ, बस्तियों में से
दौड़ता, हाँफता, बिलखता, आदमी!
जहाँ टप्परो से टपकते हैं संत्रास,
उनमें चारों ओर फैली
मच्छरों, मक्खियों की भिनभिनाहट
मुझे चैन से रहने नहीं देती

मैंने देखना - दिखाना छोड़ दिया है
जबकि वहाँ...
हमारे - तुम्हारे, इनके-उनके
फेंके गए कबाड़, उतरे- पुतरे
बीनते - बटोरते, टालते - टटोलते
वे छोटे बड़े अधमरे जिस्म
मेरे जेहन में, चेतना के संसार में
तैरते रहते हैं
मैं देखता हूँ ठगा - ठिठका
मेरी इन छलछलाई ऑंखों से
नहीं देख पाता हूँ
वे गगनचुम्बी अट्टालिकाएँ 
सभ्यता के शिखरों की चौंधियाती चमक
और उनके कदमों में पड़ी वे
अधमरे जिस्मों से भरी झुग्गियाँ

हाँ! इसलिये छोड़ दिया है मैंने..
लिखना, कहना और देखना

रामनारायण सोनी

दीप मेरे

दीप मेरे!
तुम हृदय में सजे क्या
स्वप्न जागे, रात जागी
फिर तिमिर की प्यास भागी
आत्मबोधी प्रखर प्रज्ञा
क्षणिक जग यह स्मरण है
प्राण की संचेतना का
चिन्मयी यह विस्तरण है
आ चलें हम!
रश्मियों का प्राश कर लें!


Sunday, 19 February 2023

तुम शाश्वत सत्य सनातन हो

तुम शाश्वत सत्य सनातन हो

तुम अद्भुत हो, हे वंदनीय! तुम असीम सुख दाता हो
तुम तो मेरे जीवन-धन हो तुम मेरे भाग्य विधाता हो
तुम चिदानन्द आनन्द विभो! और दुःखों के त्राता हो 
तुम ही कर्ता हर्ता सब के और जगत के धाता हो
तुम शाश्वत सत्य सनातन हो, प्रतिबिम्बित कण कण में

तुम असीम हो तुम अनन्त तुम हो व्यापक सचराचर में 
तुम परमज्योति बन कर रहते हो रवि में और सुधाकर में 
तुम ज्ञानमयी- विज्ञानमयी विद्या के परम प्रदाता हो
तुममें सब है सब में तुम हो बाहर भी तुम, तुम ही उर में
तुम शाश्वत सत्य सनातन हो, प्रतिबिम्बित कण कण में

तुमसे ही मिलता सुख-वैभव नवनिधि प्रवर प्रदाता हो
तुम पावन परमेश्वर ऐसे गुण जिनके जग गाता हो
निर्बल मन और चित्त हमारा, तुम सब कष्टों के त्राता हो
तुम उदार, उज्ज्वल, वरेण्य तुम जन जन के मन ज्ञाता हो
तुम शाश्वत सत्य सनातन हो, प्रतिबिम्बित कण कण में

तुम शाश्वत सत्य सनातन हो प्रतिबिम्बित कण कण में
तुम हो जल में थल में नभ में पावक और समीरण में
तुम ही हो वह कठिन कुलिश, तुम ही कोमल कुसुम प्रभो
तुम त्रिकाल तुम महाकाल तुम लय में और क्षरण में
तुम शाश्वत सत्य सनातन हो, प्रतिबिम्बित कण कण में

रामनारायण सोनी
१७.०२.२३

हे नाथ तुम्हें ना भूल सकूँ!

हे नाथ तुम्हें ना भूल सकूँ!

मरुथल में हो ढूँढ रहा प्यासा मृग जैसे बूँद बूँद
दिग दिगन्त में फैली है जग की तृष्णा की घनी धुन्ध
इन्द्रिय के घोड़े थके थके, काँधे आगे को झुके झुके
इस लोभ मोह के चक्कर में, आशा के टूटे सभी बन्ध
  अब तेरी याद सताती है
  आँखें भींग भींग जाती है

इस मन में मैल भरा इतना सागर में खार भरा जितना
इस पाप पुण्य की गठरी में है माल भरा मैंने कितना
पर सुमर नहीं पाया मैं तीनों पन बीत गये रीते
इस कलुष भरे जीवन को ही मैं रहा पालता इतना
  अब तेरी याद सताती है
  आँखें भींग भींग जाती है

इस हाड़ मांस के पिंजर को सारी ही उम्र सजाया हूँ
रहा बीनता कंकर पत्थर हीरा जनम गवाँया हूँ
द्वार द्वार और नगर नगर में भटक रहा था मैं अब तक
तुमने उपकार किये इतने मैं समझ अभी पाया हूँ
  अब तेरी याद सताती है
  आँखें भींग भींग जाती है

मन की अन्धी गलियों में तुम रोशन हो कर छा जाओ
अपनी करुणा से हे प्रभु! तुम मेरी झोली भर जाओ
तम के काले घन ने घेरा है दुःख दर्दों ने डाला डेरा
हे नाथ! तुम्हें ना भूल सकूँ अन्तर में ऐसे रम जाओ
  अब तेरी याद सताती है
  आँखें भींग भींग जाती है

हे प्राण कण्ठ में रुके हुए वाणी अवरुद्ध हुई जाती
कानों तक आई आवाजें फिर वापस लौट कहीं जाती
पर सिर्फ तेरी पदचाप सुनूँ यही मेरीअभिलाषा है
हे प्रणतपाल! हे दीनबन्धु! मैं हूँ बस तेरा आराती
  अब तेरी याद सताती है
  आँखें भींग भींग जाती है

रामनारायण सोनी
१६.०२.२३

Sunday, 12 February 2023

जो मिल गया सम्हाल ले

जो मिल गया सम्हाल ले

तू कौन है? विचार कर, खुदी में खुद तलाश कर
आज दिन नया मिला, इसी का तू सिंगार कर।
चुनौतियाँ हजार हों भले, तू मोर्चा संभाल ले
चला गया वो भूल जा, जो मिल गया सम्हाल ले।।

जोखिमों का काफिला है जिन्दगी में जान ले
हर कदम पे खेल है, हर खेल को पहचान ले।
खत्म खेल भूल कर तू, फिर नया तू हाथ ले
चला गया वो भूल जा, जो मिल गया सम्हाल ले।।

रोज क्यों तू मर रहा है, खुद को आज मार ले
बिछड़ गया जो आज में, कल से भी निकाल दे।
जो मिल गया, सहेज ले, बिखर गया बिसार  दे
चला गया वो भूल जा, जो मिल गया सम्हाल ले।।

आया है सो जायगा ये, मृत्यु सत्य जान कर
इस धरा पे जो धरा, धरा रहेगा ध्यान कर।
जो अरूप रूह है वो, अमर रहेगी मान ले
चला गया वो भूल जा, जो मिल गया सम्हाल ले।।

रामनारायण सोनी
१२.०२.२३

Monday, 6 February 2023

क्या देखते हो?


    🌓क्या देखते हो?🌖

रुपये के हैं दो पहलू 
एक पर उसकी कीमत है
दूसरे पर है अशोक स्तम्भ 
है जो सत्य और शौर्य का प्रतीक
पहले पर है खुद की ताकत
दूसरे पर है शासक की
फर्क ये है कि तुमने किसे देखा
फर्क है नजरिये का
फर्क है मान्यता का
फर्क है उपयोगिता का
फर्क है आपकी अन्तर्भावना का

देखता भीतर से है कोई
नागफनी और गुलाब के शूलों को
उन काटों की चुभन को
या सृजन के सौंदर्य को
उन पर महकती खबसूरत
खिलती कलियों और फूलों को
या तो देखता है वंशी के छिद्रों को
या सुनता है झरती रागिनी को

देखते तुम नहीं हो
देखता वो है जो भीतर बसता है 
अपनी कीमत पर मत अटको
सत्य और अपनी शक्ति को जानो
कौआ मान सरोवर में भी
केवल जल ही पीता है
पर हंस भी वहाँ है
जो केवल मोती ही चुगता है।

रामनारायण सोनी

Saturday, 4 February 2023

चीटियाँ हैं ये

चीटियाँ ये चीटियाँ
न दो इन्हें चुनौतियाँ

धर्म की देवियाँ हैं वे, 
साहस का प्रतिमान है वे, 
कर्म का विधान हैं वे, 
श्रम का संधान हैं वे। 
चलते चलते थकती नहीं है कभी, 
छाँव देख कर भी रुकती नहीं है कभी, 
पहाड़ के सामने भी झुकती नहीं है कभी।
चीटियाँ ये चीटियाँ
न दो इन्हें चुनौतियाँ

विश्वकर्मा ही हैं बसा इनमें 
देख लो बमीलों के वास्तु शिल्प को, 
विश्वधर्मा ही हैं ये 
देख लो उनके प्रशान्त कर्मक्षेत्र को, 
विश्वबन्धु हैं ये 
देख लो इनके सहअस्तित्व को, 
विश्वविमोहिनी हैं ये 
देख लो इनके रूप को स्वरूप को।
चीटियाँ ये चीटियाँ
न दो इन्हें चुनौतियाँ

संगठन की शक्ति ले , 
स्वामिनी की भक्ति ले , 
जीवनी की संतृप्ति ले, 
दायित्वों में अनुरक्ति ले 
अजेय हैं, प्रमेय है, विधेय है 
चीटियाँ ये चीटियाँ
न दो इन्हें चुनौतियाँ

मौसमों की मार हो, 
छुरों की तीखी धार हो, 
सिन्धु का सा क्षार हो, 
जीत हो या हार हो, 
मुँह में चाहे भार हो, 
शत्रु के प्रहार हों, 
कब डरी है चीटियाँ। 
चीटियाँ ये चीटियाँ
न दो इन्हें चुनौतियाँ

भित्तियों को लाँघ कर, 
तृणों के सेतु बाँध कर, 
दिशाएँ देख भाल कर, 
स्वप्न मन में ढाल कर, 
कदम कदम संभाल कर,
सभी जगह खंगाल कर,
बढ़ रही है चीटियाँ। 
चीटियाँ ये चीटियाँ
न दो इन्हें चुनौतियाँ

न इनका कोई जोड़ है
न जिन्दगी में मोड़ है
बसा है एक नगर यहाँ
जुड़ा है एक सफर यहाँ
रानी ही का राज्य है
परिवार अविभाज्य है
असत्य यहाँ त्याज्य है
तभी यहाँ सुराज्य है।
चीटियाँ ये चीटियाँ
न दो इन्हें चुनौतियाँ

अरे मनुज सुनो जरा
प्रबन्ध देख लो जरा
श्रेणियों के भेद है
कर्म के प्रभेद है
श्रमिक लगे हैं कार्य में
सैनिकों के फौज है
प्रचुर यहाँ आहार है
मौज का विहार है।
चीटियाँ ये चीटियाँ
न दो इन्हें चुनौतियाँ

रामनारायण सोनी
04.02.23