. ll नवगति, नवलय, ताल-छन्द नव ll * सम्वेदनाओं के विविध आयाम *
दीप मेरे! तुम हृदय में सजे क्या स्वप्न जागे, रात जागी फिर तिमिर की प्यास भागी आत्मबोधी प्रखर प्रज्ञा क्षणिक जग यह स्मरण है प्राण की संचेतना का चिन्मयी यह विस्तरण है आ चलें हम! रश्मियों का प्राश कर लें!
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