🌓क्या देखते हो?🌖
रुपये के हैं दो पहलू
एक पर उसकी कीमत है
दूसरे पर है अशोक स्तम्भ
है जो सत्य और शौर्य का प्रतीक
पहले पर है खुद की ताकत
दूसरे पर है शासक की
फर्क ये है कि तुमने किसे देखा
फर्क है नजरिये का
फर्क है मान्यता का
फर्क है उपयोगिता का
फर्क है आपकी अन्तर्भावना का
देखता भीतर से है कोई
नागफनी और गुलाब के शूलों को
उन काटों की चुभन को
या सृजन के सौंदर्य को
उन पर महकती खबसूरत
खिलती कलियों और फूलों को
या तो देखता है वंशी के छिद्रों को
या सुनता है झरती रागिनी को
देखते तुम नहीं हो
देखता वो है जो भीतर बसता है
अपनी कीमत पर मत अटको
सत्य और अपनी शक्ति को जानो
कौआ मान सरोवर में भी
केवल जल ही पीता है
पर हंस भी वहाँ है
जो केवल मोती ही चुगता है।
रामनारायण सोनी
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