छोड़ दिया लिखना मैंने
मैंने लिखना छोड़ दिया है
क्योंकि मैं...
किताबों में लिखे चेहरे
और चेहरे पर लिखी किताब
पढ़ना चाहता हूँ
इसलिये मैंने लिखना छोड़ दिया है
मैंने कहना छोड़ दिया है
क्योंकि मैं..
तुम्हारी पीड़ा, सुख-दुःख
तुम्हारी अनुभूतियाँ,
जिन्दगी के कड़वे, खट्टे-मीठे
सच सुनना चाहता हूँ
इसलिये मैंने कहना छोड़ दिया है
मैंने देखना छोड़ दिया है
अब मुझे महलों दुमहलों की
खिड़कियाँ, मेहराबें और कंगूरे में
दम्भ ही दम्भ नजर आता है।
मुझे एक गहरी खाई दिखाई पड़ती है..
बड़ी मंजिलों वाले घरों और
पसीने से लथपथ इन मजूरों की
बरसाती से ढँकी वे झुग्गियों में
इन निचली बस्तियाँ, बस्तियों में से
दौड़ता, हाँफता, बिलखता, आदमी!
जहाँ टप्परो से टपकते हैं संत्रास,
उनमें चारों ओर फैली
मच्छरों, मक्खियों की भिनभिनाहट
मुझे चैन से रहने नहीं देती
मैंने देखना - दिखाना छोड़ दिया है
जबकि वहाँ...
हमारे - तुम्हारे, इनके-उनके
फेंके गए कबाड़, उतरे- पुतरे
बीनते - बटोरते, टालते - टटोलते
वे छोटे बड़े अधमरे जिस्म
मेरे जेहन में, चेतना के संसार में
तैरते रहते हैं
मैं देखता हूँ ठगा - ठिठका
मेरी इन छलछलाई ऑंखों से
नहीं देख पाता हूँ
वे गगनचुम्बी अट्टालिकाएँ
सभ्यता के शिखरों की चौंधियाती चमक
और उनके कदमों में पड़ी वे
अधमरे जिस्मों से भरी झुग्गियाँ
हाँ! इसलिये छोड़ दिया है मैंने..
लिखना, कहना और देखना
रामनारायण सोनी
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