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Wednesday, 24 August 2022

कैसी ये खुशफहमियाँ

एक दिन इश्क के महल में
घुस क्या गया मैं
रास्ते, दरवाज़े, बाहर जाने के
बन्द हो गए हैं सभी
पर तभी कोई दीवार चठकी
और तुम शायद मलबे के उस पार खड़े थे 
बस आवाजें दौड़ती हैं मेरी सभी दिशाओं में
गूँज उठती है मेरी पुकार कि तुम कहाँ हो?
पूछता हूँ दरख्तों से, आम्र कुञ्जो से, 
तितलियों से, उन सूख चुके फूलों से
पर मेरी प्रतिध्वनियाँ, मेरी पदचाप
सिर पीटती हुई लौट लौट कर आती है
बावजूद इसके मैं खुश हो लेता हूँ
कि जैसे वे तुम्हारी ही हैं
देखा नहीं किसी ने भी
मेरी गलत फहमियों को 
इस तरह खुश फहमियों में बदलते

रामनारायण सोनी
२५.०८.२२

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