गर मैं पागल होता
गर मैं पागल होता तो
बस तू होता और मैं होता
प्याले पर नाम तेरा होता
तो विष भी वह अमृत होता
आँसू धार बही सब खातिर
पर एक बूँद तुझे चढ़ जाती
मेरे अगले पिछले सारे
जनम जनम के अघ धो जाती
गर मैं पागल होता तो
बस तू होता और मैं होता।।
लौटा दे वह भोला बचपन
जब तू संग रमा करता था
तुतलाती लटपट बानी तू
जो हर बार सुना करता था
मुझे जिताने खातिर नटखट
खुद तू हार लिया करता था
रोता था मैं जब जब गिर कर
बढ तू थाम लिया करता था
गर मैं पागल होता तो
बस तू होता और मैं होता।।
मैंने कभी नहीं माँगा कुछ
सब देता है, तेरी मर्जी
चाहे दे इस हाथ अभी ये
फिर लौटा ले, तेरी मर्जी
जनम मरण है हाथ तुम्हारे
यह जीवन भी, तेरी मर्जी
बाहर भीतर तू ही तू है
इतना सा गर समझा होता
गर मैं पागल होता तो
बस तू होता और मैं होता।।
जर्जर मेरी नाव हुई है
तट भी छूट गये हैं सारे
धार तेज है भँवर बड़े हैं
तन भी मन भी दोनों हारे
बिन पतवार बही जाती है
मेरा भरोसा है कि तुम ही
मातु पिता या बन्धु बनोगे
भव से तारोगे बस तुम ही
गर मैं पागल होता तो
बस तू होता और मैं होता।।
रामनारायण सोनी
२८.०८.२२
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