गगन तुम्हारे अमित रूप
गगन तुम्हारे अमित रूप, पर हर रूप निराला है
दिन में कितना उजला है, और रजनी में काला है।
सघन घनों को धरते हो तो, श्यामल तुम हो जाते हो
स्वच्छ सलोने हो कर तुम, नील गगन कहलाते हो।
गगन तुम्हारे अमित रूप, पर हर रूप निराला है।।
प्राची में जब अरुणिम ऊषा, सूरज ले कर आता है
वह कनक थाल तब तब, कुंकुम रोली बिखराता है।
कभी टाँक लेते हो तन में, तारक हीरे माणक मोती
कभी चाँदनी घोल धरा को, पहनाते दुधिया धोती।
गगन तुम्हारे अमित रूप, पर हर रूप निराला है।।
बने क्षितिज पे नील कटोरा, तान रहे हो तुम वितान
इसमें जग ने हर दिन देखे, नित नूतन नव-नव विहान।
कभी चंदोवा तनता नभ में रजत थाल सज जाती है
अमृत की गागर फिर भर कर धरा धाम नहलाती है।
गगन तुम्हारे अमित रूप, पर हर रूप निराला है।।
रामनारायण सोनी
२७.०८.२२
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