😳 किसे ढूँढता है यह सक्ष 😢
बिल्लोरी काँच की ऐनक के
पीछे से एक जोड़ी नम आँखें
धुन्दियाती, चुन्धियाती आँखें
नीले विस्तीर्ण अम्बर पर छितरे
श्वेत श्याम बादलों में गड़ जाती है
सहसा उभरता है बेटे का बचपन
खिलखिलाता रेशमी एहसास सा
तभी वक्त की बहकी हवाएँ चली
बादल बिखर गए गल गल कर
टूटी तन्द्रा, पसर गई नीरवता
जिन्दगी तार-तार, निराधार
शून्य ही शून्य चहुँ ओर
खाली आसमान अनन्त अपार
कितना खाली खाली संसार
बचपन जो उसकी गोद खेला
अपनी काँपती उंगलियोँ में अब
उस बेटे की छुअन को ढूँढता है
उम्र से झुके इन काँधों पर
बैठे मचलते उस बचपन के
महसूस करता है भार को
तब ये काँधे जवान थे
हाथों में भी कर्म के संधान थे
अब अहसास का बोझ भी असह्य है
शिराएँ मन्द हैं, धमनियाँ निष्पन्द हैं
इधर तन गला गला, मन बुझा बुझा
बातें सिर्फ फजाएँ ही सुनती है
आशाएँ अपने हाथों सिर धुनती हैं
फिर भी आशीष को उठे हाथ
दिशाओं में फैल जाते हैं
खाली आसमान अनन्त अपार
कितना खाली खाली संसार
किस कदर ये पीढ़ियाँ बदल गई
संस्कृति पूरी की पूरी निगल गई
संवेदनाएँ श्मसान में और
श्मसान चौराहे पर खड़ा है
विश्व-गुरू की आकाँक्षा, आदर्श लिए
राष्ट्र कितना बेसुध पड़ा है
अतीत की पोटली से सोनचिरैया
चीख चीख दुनिया को दिखाते हैं
स्वर्ण कूड़े के बदले बिक चुका है
चिरैया बेजान खिलौना हो चुका है।
जानती नहीं पीढ़ियों की ये भेड़ें
एक दिन इसी गर्त में वे ही गिरनी है।
खाली आसमान अनन्त अपार
कितना खाली खाली संसार
रामनारायण सोनी
No comments:
Post a Comment