Pages

Saturday, 17 September 2022

सृष्टि है यह ईशमय

चाँदनी कब थी अलग जो चाँद में नभ में घुली
रोशनी को सूर्य से ना तुम अलग देखा करो।
इस सनातन सत्य को तुम जान लो पहचान लो 
इस जगत की अस्मिता को ईशमय देखा करो।।

सृष्टि का साकार दर्शन उस परम का दर्श समझो
जो पवन छू कर गई यह है मृदुल स्पर्श उस का।
भूख भी उसने बनाई अन्न भी उसने दिया है
वह पचाता जठर में खेल यह सब है उसी का।।

पाँच भूतों, पाँच तत्वों, पाँच प्राणों से बनाया
इन प्रपञ्चों से बुना है यह महा जंजाल समझो।
इन्द्रियों के पंचकों से इस कर्म का साधन लगाया
बुद्धि, मन और चित्त जोड़े यह तेरे भीतर सजाया।।

ज्योतियों की है परम ज्योति जो हमें ना दीख पाती 
सूक्ष्मतम प्रज्ञा हृदय में ज्ञान का दीपक जलाती।
चेतना बन प्रभु हमारे सर्व में बसता निरन्तर
वह चलाता,वह जिलाता न दृष्टि अपनी देख पाती।।

चेतना भर प्राण में, इन इन्द्रियों में और तन में
चर अचर में व्यापता है और है हर सूक्ष्म कण में।
दीखते न कर कहीं पर सृष्टि सारी रच रहा है
रंच भर न है कमी उसके करम में और सृजन में।। 

प्यास भी वह दे रहा है फिर बुझाने का जतन 
भूख का अध्यास दे कर दे रहा उसका शमन।
रात का दे कर तमस दी रोशनी भी सूर्य की
जाग दे कर नींद का कैसा निराला है प्रबन्धन।।

सत्य है केवल वही जगत मिथ्या का मिथक
सृष्टि के पहले वही था सृष्टि का केवल सृजक।
जो प्रलय के बाद भी होगा सिर्फ वह ब्रह्म ही
सृष्टिस्थितिविनाशानां है कार्य कारण सब वही।।

वचन अगोचर, दृष्टि अनामय, सृष्टि नियन्ता वो ही
अशरण शरण, भव-भय भंजक परमोद्धारक वो ही।
उसमें सब है सब में वह है होता वह, कर्ता वो ही
सब में उसको देखे जो नर ईश कृपा पाता वो ही ॥

रामनारायण सोनी
१८.०९.२२

No comments:

Post a Comment