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Saturday, 17 September 2022

ज़िंदगी ज़िंदगी

जिन्दगी सिर्फ साढ़े तीन हर्फों की है

कब से लिखे जा रहा हूँ इस को
जिसको ज यानी जन्म से शुरू किया था
बचपन इस में इ की मात्रा लगाने में
याने इल्म पाने में खर्च हो गई
कई अच्छे मकाम जो थे रास्ते में
कुछ बरस इसके माथे बिंदी चढ़ाने में गुजरे
और मैं देख ता ही रह गया
जिदगी की दौड़ती रेल गाड़ी में बैठा रहा मैं
बाहर गाँव, नगर, नदी, पहाड़ और
द-से शुरू होने वाली यह दुनिया
सब के सब दौड़ते दिखाई दिये
ग से गुजरते गए कई मोड़
और जुड़ते गए कई जोड़
हॉफती रही यह फिर भी दौड़ती ही गई
द्वन्द्वों के बीच कौंधती रही कहीं कहीं
हास्य की निसर्ग रेखाएँ 
तमस भरे बादलों में बिजलियों की तरह
भाग्य के परिताप से पीछे रह गए
वे रिश्ते, वे लोग, वे राहें, वे पगडण्डियाँ
जानती है जिन्दगी की नदी कि
पास ही कहीं है समुन्दर का वो मुहाना
जिसे छोर कह लो, मृत्यु कह लो
चिर विछोह कह लो
संज्ञा और नाम इस के कई है
हर वर्तमान के काल के भाल पर
अतीत की मुहर जरूर लगती है
जिंदगी प्रमेय नहीं हो सकती
इसमें दो और दो हमेशा चार नहीं होते...

रामनारायण सोनी
१७.०९.२२

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