मुझे वह तारीख तो याद नहीं
पर समय के परिन्दे का वह सफर
वह हाथों पर टिकी ठोड़ी
चेहरे पर खिलखिलाता तबस्सुम
नीली झील से झाँकते नयन
ध्वजा से लहराते कुटिल कुन्तल
काँपते से वे अधर
कुछ कहने को आतुर, लेकिन..
हुनर नजरों से ही कहने का
सुना था, महसूस किया था
मेरी ठगी, ठहरी, सम्मोहित नजरों ने ही
क्या वह तुम नहीं थी?
रामनारायण सोनी
१.१०.२२
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