.कुछ कहानियाँ!!!
अधूरी ही होती!
निष्ठुरता भी इतनी कि
वे पूरी नहीं होती कभी भी...
लेकिन वे अनवरत रेंगती रहती है
धमनियों, शिराओं और मगज में
पिघले सीसे की तरह
सफ़र इनका कहीं से शुरू हुआ
और जाने क्यों, न आधा न पूरा हुआ
इनमें चल रहे रास्तों का क्या ठिकाना?
मुड़ जाते हैं अचानक
कभी भी, कहीं भी, कैसे भी
जंगली हवाओं की तरह
मैं देखता रहता हूँ लाचार हो कर
अपनी ही कहानियों को
निरीह सूत्रधार की तरह
चलता हूँ ढोता हुआ इन्हें
अपनी ही पीठ पर
वैताल की तरह
रामनारायण सोनी
१.६.२२
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