*अब क्या लिखूँ मै*
जब भी मैं गाँव लिखता हूँ
गाँव का चौपाल लिखता हूँ
चौपाल में खड़ा वटवृक्ष दिखता है
वटवृक्ष पर चिटिर पिटिर करते
रक्तकण्ठी हरे कच तोते लिखने लगता हूँ
फिर सूरज से आती उस अप्रतिम ऊर्जा को!
देखता हूँ जीवनी शक्ति में परिवर्तन होते
हाँ फिर जब जब मैं
आश्रम बनते देखता हूँ....
वनस्थली के घर आँगन को!
बाड़े में रंभाते गाय के बछड़े को!
ममतामयी छाया में दुलार का स्पर्श देखता हूँ!!
जहाँ पवन बुहारता है घर, आँगन, वन, उपवन,
सरसराता हुआ संगीत भी सुनाता है,
फिर...
जब मैं लिखता हूँ गँवई लोक धुन पर
थिरकती हुई किशोरियाँ का रुचिर लोकनृत्य
जहाँ प्रकृति स्वयं लाती है प्रभाती का पर्व
और भी है अनगिनत जो मैं लिख नहीं सका
इनकी सब की हर आहट में देखता हूँ,
नितान्त स्तब्ध हो कर
तो उभरता है धरा की सुरम्य गोद में
एक सौम्य सा, सरल सा मन्दस्मित चेहरा...
ममत्व से, अपनत्व से भरा
तुम्हारा ही!
कौन हो तुम!!!?
रामनारायण सोनी
(परिष्कृत
१७.१२.२२)
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