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Thursday, 5 May 2022

प्रीत मेरी

प्रीत मेरी देह संग ना मर सकेगी
   प्रीत मेरी साँझ सी ना ढल सकेगी।।
    प्रीत की न उम्र है ना परिधियाँ ही
     प्रीत मेरी मेघ सी न गल सकेगी।

प्रीत रूहों के मिलन का नाम है
 प्राण में होता विलय जहँ प्राण है
  रूप का लालित्य बाहर हो खड़ा
   बन्धनों से मुक्ति है और त्राण है

अग्नि भी ना दह सकी इस प्रीत को
 सह सका ना क्यों जगत मन प्रीत को
  प्यास अधरों पर रुकी ले कण्ठ की
   सुन पपीहा स्वाँति के प्रिय गीत को

रामनारायण सोनी
६.५.२२

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