जब जब जीवन की पतंग के
पेच कहीं ये उलझे हैं
वाणी भी जो बोल सकी ना
तूने भाव सभी समझे हैं
जीवन की चादर करघे के
जब जब तार मेरे बिखरे हैं
तब तब कृपा तेरी बरसी है
बिगड़े काज सभी सुधरे हैं
इस भीतर की तनहाई मे मैं
एकाकी जब जब हो पाता हूँ
यह भीड़ कहीं खो जाती है
बस साथ तेरे रह जाता हूँ।
उस खास घड़ी को जी कर ही
सदियाँ पल में जी लेता हूँ
गरल भरे इस सागर में भी
अमिय घूँट कुछ पी लेता हूँ
अन्तःपुर के खोल किवारे
जब जब तू घर आता है
मेरा अगला पिछला जीवन
कितना पावन हो जाता है
रामनारायण सोनी
१३.०५.२२
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