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Saturday, 28 May 2022

उठो भी!

मैं सोया हुआ था
पर मुझ में वह जाग रहा था
जैसे जगा रहा हो मुझे
उठो भी! 
बहारें फिर लौट आई हैं
उस सरोवर के किनारे
प्रतीक्षारत हैं वे पथरीली आसन्दियाँ
बैठ लो घड़ीक भर,
बतखों का वही जोड़ा
जल में खिले शतदलों के बीच
डूबता उतराता है 
विस्तीर्ण नीलनभ की ओर उठी 
आह्लादित आतुर बाजुएँ
खुली हैं स्वागत में
आओ खींच लाएँ उन
मधुमय पलों के पाँखियों को
जियें फिर कल को
आज में, अभी ही

रामनारायण सोनी
२८.०५.२२

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