Pages

Thursday, 12 May 2022

झरना झराता है



चाहे जितना बिखर जाए पानी उसका
बिखर बिखर धुआँ धुआँ हो जाए भले ही
परन्तु झरना जो एक मौज है
झरना जो एक उल्लास है
झरते ही जाना है इसे, 
झरते ही जाना है इसे
और सवार हो जाना है
हवा के महीन परों पर
उसकी धवल धार 
है कण कण का विस्तार 
गिरते जाना है ऊँचाइयों से..
सख्त चट्टानों की सख्त छातियों पर
झर-झर झरझराता नाद ही
गिर कर जब उठ खड़ा होगा
अपनी वही पुरानी धार ले कर 
फेनिल ही काया है इसकी
मस्ती में फिर से बहेगा
पतन की यादों को झाड़ कर
टूट कर बिखरना, 
बिखर कर फिर जुड़ना
साहस और सामर्थ्य है इसका
वन प्रान्तर में उसकी गूँज होंगी मौजूद
झरना इरझराता हो
जैसे अब भी
गाता है, आता है 
जीवन का मधुमय संगीत लेकर

रामनारायण सोनी
१३.०५.२२

No comments:

Post a Comment