ग्रेनाइट की काली सख्त चट्टान पर
पैनी छैनी से खुदी
सुकोमल सुरमई यादें
टटोल लेता हूँ मैं
एकाकीपन के घुप्प अँधेरो में भी
मिट नही सकेंगी कभी यादें ये।
अलबत्ता कतरा कतरा हो कर
बिखर जावेंगी किसी भी दिन
चट्टान के तिलिस्मी जिस्म के संग
उसकी धूल से निकलती वे सदाएँ
पुकारेंगी तुम्हें फिर! फिर!!
कि तुम!!
पिसी मेंहदी, झरे फूल
गुलाबजल सौंधियाती मिट्टी में
रची बसी खुशबू की तरह
अब भी मौजूद हो मुझ में
तुम्हें पता है कि नहीं?
रामनारायण सोनी
०९.०५. २०२२
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