Pages

Wednesday, 22 June 2022

अनगढ़ यह नगीना

मेरे पास
लमहों का एक ज्वेलरी बॉक्स है
उसमें कुछ ताज के जड़ाऊ नगीने हैं
कुछ लाल, हरे, नीले, पीले
जिन्हें मैं कभी नहीं पहनता
पर एक नायाब नगीना
रखा है एक गुप्त खाने में
अनतराशा ही रह गया वह,
निकाल कर जब रखता हूँ
यादों की अकेली अँधेरी कोठरी में
एक फफ़कता उजास फैल जाता है
बाहर भी और मेरे ठेठ भीतर तक भी
मैं उसे चूमता हूँ बार बार
बाकी सब नागीनों ने तो 
देखी है मेरे चेहरे की चमक दमक
पर इस अलहदा अनगढ़ से नगीने ने
देखे हैं कई बार मेरे नयनों के
खारे उफनते, बहते आँसुओं के सागर को।
अब कोई आए कहीं से और
ले जावे छीन कर सारा मालोअसबाब
बस छोड़ कर केवल
एक अदद इस अनतराशे नगीने को

रामनारायण सोनी
२१.०६.२२

No comments:

Post a Comment