ऐ जिन्दगी
जिन्दगी मोड़ दे कर मुझे
खुद तो वहीं खड़ी है
कई ख्वाहिशें गलियारों में
अब भी वहीं पड़ी हैं
ऐ जिन्दगी खुद याद कर
तू कब गले मिली थी
बस मैं ही चला अकेला
तू साथ कब चली थी
खुश्क है तेरी हवाएँ
पी गई पानी नयन का
सूख कर काँटा हुआ हर
फूल मेरे इस चमन का
गुजरते हुए पलों की
रफ्तार कम तो कर ले
ले लूँ जरा सा दम मैं
तू भी जरा तो दम ले
लौटेंगे फिर कभी ना
जो जो भी मेरे संग है
फिर से न मिल सकेगा
यही मौज की लहर है
फिर कब जुड़ेंगे मेले
अपनों का साथ इतना
टूटे न ख्वाब कोई
अब टूटे न कोई सपना
छोटी सी मेरी अँजुरी
थोडी बिसात इसकी
है डोर मेरी उलझी
थगती हुई पतंग की
इक दौर वो था जिसमें
रोशन चराग थे सब
इक दौर ये है जिसमें
श्याही में डूबी है शब
रामनारायण सोनी
१४.०६.२३
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