रंगकर्म का सूत्रधार
कैसे सूत्रधार हो तुम
बिना मुखौटे के भी
चेहरा बदल दिया है मेरा तुमने!
मेरी ही आवाज में मुझमें से अब
बोलता है कोई और ही
तुम्हारे रंगकर्म में अब
धरातल पर कर्म के रंग नहीं बचे हैं
सब कुछ आभासी हो चुका है
सिनेमा घर के निर्जीव पर्दों पर
चलती हुई परछाइयों की तरह
मेरी पुतलियों में तो बस
कठपुतलियाँ ही नृत्य करती हैं
नेपथ्य में बजती हुई थाप पर
मैं उछलता हूँ, कूदता हूँ, रोता-हँसता हूँ
उन सामने की कुर्सियों पर
लोग अँधेरे में ही डूबे डूबे
बड़े अजीब हैं ये लोग
मेरे साथ साथ बहने लगते हैं
वे खुद को
मुझ में ही जीने लगते हैं
वे शायद जानते नहीं कि
मैं खुद ही ढँका हुआ होता हूँ पूरा का पूरा
चोलों, लबादों और मुखौटों से
कभी कभी ये लोग
मेरे रोने पर खुशियाँ मनाते हैं
जैसे बच्चा जन्मते ही रोता है, तब
मेरे हँसने पर गुस्साते है, तब
जैसे खलनायक ने ठहाका लगाया हो
तंग आ चुका हूँ दूसरे-दूसरों को जीते जीते
हे मेरे जीवन के सूत्रधार!
अब.....
मैं मुझमें लौटना चाहता हूँ!
रामनारायण सोनी
०६.०६.२३
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