रंग मेरी संकल्पना के
भले ही मैं बेढब होऊँ कितना ही,
मैं और मेरी संकल्पनाएँ
विनम्र और स्पन्जी हैं,
सोंखती है पहले जमाने भर के रंगों को
अपने भीतर के महीन सुराखों में
उँडेलती हैं कैनवास की धरती पर
और देखो कैसे हटात् उग आये हैं!
ये सब्ज पेड़ और
मेरी पुतलियों में
धरती यह तृणावर्त हो गई हैं
लौट आये है आप्रवासी पाँखी
और मैं!
मैं आनन्द से भर गया हूँ!
गले-गले तक!!
रामनारायण सोनी
०४.०६.२३
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