नवगीत
मन गीत कोई गाने लागा है
विकल हृदय और तृषित अधर पर
जब से तेरी नवगुलाब की
पंखुड़ियों की छुअन मिली है।
मन की तपती हुई धरा को,
ओ शुष्क कंठ को
अमित नेह के रुचिर मेघ की
मीठी बूँद मिली है।।
मुझमें इक पावस जागा है।
मन गीत कोई गाने लागा है।।
शतदल से इस हृदय पत्र पर
बैठे हैं शबनम के मोती
अम्बर की चूनर में राका
तारक की मणिमाल पिरोती
प्रखर प्रेम में सनी वर्तिका
थाम खड़ी है जगमग ज्योति
ऐसे में पढ़ने को आतुर
तेरे इन नयनों की पाती
यह प्रेम दीप ऐसे जागा है।
मन गीत कोई गाने लागा है।।
जी चाहे फिर प्यास लगे,
फिर नयनों में आस जगे
फिर सीपी के फलक खुले वो
मोती का सा प्रेम पगे।
रीती गागर, सूने पनघट,
पनिहारिन के रसरी के संग
सर सर कर आती जाती
स्वाँस जगे प्रश्वाँस जगे।।
अवगुण्ठन को जी भागा है।
मन गीत कोई गाने लागा है।।
रामनारायण सोनी
०१.०७.२३
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