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Saturday, 15 July 2023

कितना हो कर देखा मैंने

 कितना हो कर देखा मैंने


तुम्हारे बगैर कितना हो कर देखा है मैंने
मैंने हटात् देखा कि 
मैं शून्य की चट्टान से टकरा गया हूँ
कैसी फिसलन है ये
जो यादों के खण्डहर की
उस बावड़ी तक जाती है
जहाँ दलदल भर बची है अब।

तुम्हारे बगैर कितना हो कर देखा मैंने
चाँद तो रहा हूँ मैं, पर
भाग्य की कालिमा ने ढँक लिया मुझे
देखो! मैं अमावस का हो कर रह गया हूँ।

तुम्हारे बगैर कितना हो कर देखा मैंने
दीपक सा देखता हूँ औचक कर
निगल रही है दीपशिखा को
अपनी ही आशा की वर्तिका

तुम्हारे बगैर कितना हो कर देखा मैंने
हम दोनों की बीच की नेह सरिता की
धार सूख चली है
हमें नौकायन कराने वाली
कश्ती औंधे मुँह पड़ी है 
बिरहा की तपती रेत में

तुम्हारे बगैर कितना हो कर देखा मैंने
हथेली में बिधना की खींची रेखा
डोर थी जोड़ने वाली हमें-तुम्हें
उन हवाओं से बतियाती 
अठखेलियाँ करती पतंग की
मेरे हाथों में के हुचके से बिछुड़ गई है।

तुम्हारे बगैर कितना हो कर देखा मैंने
दौड़ता हूँ वृत्त की अन्तहीन
परिधि पर निरन्तर
न तो तुम मिले मेरे आवर्त में, 
तिस पर, खो गया हूँ मैं ही 

रामनारायण सोनी
३.०७.२३

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