कितना हो कर देखा मैंने
तुम्हारे बगैर कितना हो कर देखा है मैंने
मैंने हटात् देखा कि
मैं शून्य की चट्टान से टकरा गया हूँ
कैसी फिसलन है ये
जो यादों के खण्डहर की
उस बावड़ी तक जाती है
जहाँ दलदल भर बची है अब।
तुम्हारे बगैर कितना हो कर देखा मैंने
चाँद तो रहा हूँ मैं, पर
भाग्य की कालिमा ने ढँक लिया मुझे
देखो! मैं अमावस का हो कर रह गया हूँ।
तुम्हारे बगैर कितना हो कर देखा मैंने
दीपक सा देखता हूँ औचक कर
निगल रही है दीपशिखा को
अपनी ही आशा की वर्तिका
तुम्हारे बगैर कितना हो कर देखा मैंने
हम दोनों की बीच की नेह सरिता की
धार सूख चली है
हमें नौकायन कराने वाली
कश्ती औंधे मुँह पड़ी है
बिरहा की तपती रेत में
तुम्हारे बगैर कितना हो कर देखा मैंने
हथेली में बिधना की खींची रेखा
डोर थी जोड़ने वाली हमें-तुम्हें
उन हवाओं से बतियाती
अठखेलियाँ करती पतंग की
मेरे हाथों में के हुचके से बिछुड़ गई है।
तुम्हारे बगैर कितना हो कर देखा मैंने
दौड़ता हूँ वृत्त की अन्तहीन
परिधि पर निरन्तर
न तो तुम मिले मेरे आवर्त में,
तिस पर, खो गया हूँ मैं ही
रामनारायण सोनी
३.०७.२३
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