मैं थोड़ा थोड़ा छूट गया हूँ
माँ बाबा की गोदी में मैं कुछ थोड़ा सा छूट गया हूँ
तुतलाती बोली ले उनके कानों में कुछ छूट गया हूँ
पलटा पीछे तो देखा वे कहीं दूर जो निकल गये हैं
खेल नियति के देख देख मैं बचपन में ही खूट गया हूँ
उन पल की पदचाप सुनी तो तिनका तिनका टूट गया हूँ
खड़िया की टूटी कलमों का मुँह में स्वाद अभी बाकी है
थूँक लगा कर लिखा मिटाकर पट्टी कैसे ढाँकी है
छड़ी गुरू की हाथ पड़ी थी अब भी मुझको याद बड़ी है
फिर भी सिर पर नेहिल उनकी छुअन अभी बाकी हैन्
पहले गुरू की पहली शिक्षा घूँट घूँट कर तभी पिया हूँ
उन पल की पदचाप सुनी तो तिनका तिनका टूट गया हूँ
अन्नी चन्नी, लंगड़ी में कुछ अंगबंग और चोक चंग में
सोलह सार मंडी फर्शी पर रोत्ता खेले यार संग में
होली के वे शक्कर गहने, पहने फिर कुट कुट खाये थे
कैसी शरम सरल बचपन में खेले खाये अजब ढंग में
उन सोने चाँदी के दिन में थोड़ा थोड़ा छूट गया हूँ
उन पल की पदचाप सुनी तो तिनका तिनका टूट गया हूँ
रामनारायण सोनी
०७.०७.२३
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