आओ! तुम भी सुनो जरा!
दिशाएँ बोलती हैं
दरख्त, फ़िजाएँ, तितलियाँ
सब कैसे बोलती हैं
उनकी अपनी जुबानी
वे ध्वनियाँ धन्य हैं
जो ले कर आती हैं
प्रतिध्वनियाँ फिर फिर दिलों तक
आवाजें दी थी मैंने कभी तुम्हें
जो दिशाओं में
गूँजती, अनुगूँजती हैं फिर फिर
वे न मरी हैं न मरेंगी कभी
आओ! तुम भी सुनो!
इसलिये कि...
इनमें तुम भी हो! मैं भी हूँ! साथ साथ!
रामनारायण सोनी
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