मिट्टी का ढेला जमीं से उठाया
तुम्हीं ने मुझे चाक पर था चढ़ाया।
हुई रोशनी तैल बाती दी तुमने
अंधेरों से लड़ने हमें था सिखाया।।
मैं मिट्टी था मिट्टी थी पहिचान मेरी
मेरी जात औकात मिट्टी थी मेरी।
बैठा था गोदी, धरा मेरी माँ थी
फ़कत है जगह ताक में अब तो मेरी।।
आँखों में आँखें धरे चाँद तारे
बतियाते थे सब वो सगे थे हमारे I
दीवारो दर में बने हम तो बन्दी
हमारी नजर में हमीं हैं बिचारे।।
मिला सुब्ह सूरज तो इतरा रहे थे
ढली शाम साये जब गहरा रहे थे।
जले हैं हमीं आग पी पी के ऐसी
जला के हमीं खुद को, शरमा रहे थे।।
ये अलग बात है हमसे रिश्ते नये हैं
हुई रोशनी संग अपनी सगाई।
सीखा है हमने यूँ जलना खुशी से
पीड़ा जलन की है जग से छुपाई।।
परवाना जब भी, जलता है मुझ में
बैठ बैठ जाता है, मजबूर दिल ये ।
बुझूँगा जलूँगा कई बार मैं तो
इसे जिन्दगी तो, मिलेगी ना फिर ये।।
देखे हैं मैंने कई रंग जग के
आले में चुपचाप दर्शक बना हूँ।
कभी प्रेमियों की चुहल भी सुनी है
कभी प्रेम के मैं रस में सना हूँ।।
रामनारायण सोनी
०३.०५.२२
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