मैं तुम्हारी जीत और अपनी हार की जिद कर बैठा हूँ ।
रोशनी मीलों पीछे छोड़ अँधेरों से प्यार कर बैठा हूँ
आईना ही झूँठ बोलता रहा मुझसे जिन्दगी भर
न जाने क्यों बुतों को ही मैं जिन्दा मान बैठा हूँ।।
ये माना जिन्दगी तो बुलबुला है क्या सफर इसका
मिली गिनती की जो सांसें भरोसा क्या करें इनका
मगर जीना मयस्सर हो गया तो दो घड़ी जी लें
मिला ले धडकनें धडकन में, न ठहरे सिलसिला इनका।
रामनारायण सोनी
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