इसलिए तो कहता हूँ!!!
मेरी कृतियों में से अगर तुम निकल गए
तो उन आड़े तिरछे निरर्थक
अक्षरों, शब्दों में बचेगा ही क्या?
देखना चाहते हो अगर स्वयं को तुम
तो मेरी रचनाओं में
बस एक बार
हाँ! एक बार घूम कर चले जाना!
कि क्या हो तुम
मेरे लिये।
यहाँ! बस तुम ही तुम हो!!
रामनारायण सोनी
२६.०२.२२
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