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Sunday, 13 February 2022

धरा का श्रृंगार


जब हृदय की भित्तियाँ रंगीन हों
जब शिराओं में प्रवाहित ओज हो
ताल लय से हो स्वरित सुर सर्जना
प्राण में रंजित रुचिर मधुमास हो
    रंग, रस और रूप का आलेप ले
    यह धरा श्रृंगार खुद का कर रही 

फूटती हो जव रुपहली रश्मियाँ
गा रही हो भैरवी सुरभित पवन
पीत पुष्पा अमलतासी वेणियाँ
स्वागतों में हो खड़े आतुर सुमन
    रंग, रस और रूप का आलेप ले
    यह धरा श्रृंगार खुद का कर रही 

 
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किंकिणी कर की खनकती

मन तरंगित 
 मिल स्वरों  जहाँ 

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