जब हृदय की भित्तियाँ रंगीन हों
जब शिराओं में प्रवाहित ओज हो
ताल लय से हो स्वरित सुर सर्जना
प्राण में रंजित रुचिर मधुमास हो
रंग, रस और रूप का आलेप ले
यह धरा श्रृंगार खुद का कर रही
फूटती हो जव रुपहली रश्मियाँ
गा रही हो भैरवी सुरभित पवन
पीत पुष्पा अमलतासी वेणियाँ
स्वागतों में हो खड़े आतुर सुमन
रंग, रस और रूप का आलेप ले
यह धरा श्रृंगार खुद का कर रही
Contd...
किंकिणी कर की खनकती
मन तरंगित
मिल स्वरों जहाँ
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