आज फिर संध्या खिली है
रोलियाँ घन में घुली है
पर रुदन का साज ले कर, पीर का आघात ले कर।
बिन तुम्हारे प्रीत का अभिसार ले कर क्या करूँगा।
नीर खुद प्यासा खड़ा फिर प्यास ले कर क्या करूँगा।।
बीज स्वप्नों के सलोने,
हो रहे कितने अलोने
मुट्ठियों से जो फिसलते, रेत में गिर कर पिघलते।
बिन तुम्हारे नेह का अधिभार ले कर क्या करूँगा।
नीर खुद प्यासा खड़ा फिर प्यास ले कर क्या करूँगा।।
लोचनों से अश्रु फूटे
आस के अनुबन्ध टूटे
इस हृदय के द्वार सिसके, अंगना के रंग फीके।
बिन तुम्हारे आगमन गल हार ले कर क्या करूँगा।
नीर खुद प्यासा खड़ा फिर प्यास ले कर क्या करूँगा।।
बाग महके शाख चहके
गुंजरित हो भ्रमर थिरके
सज रही सारी दिशाएँ, कह रही अपनी कथाएँ।
बिन तुम्हारे दर्श के श्रृंगार ले कर क्या करूँगा।
नीर खुद प्यासा खड़ा फिर प्यास ले कर क्या करूँगा।।
रामनारायण सोनी
१५.०२.२२
No comments:
Post a Comment