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Sunday, 13 February 2022

एक बूँद का महाकाव्य

"ओस"
एक बूँद का वह महाकाव्य
रात के इस अन्तिम प्रहर में
आसमान से निचुड़ा आसव
प्रकृति के सुमधुर आँचल से
उतरा उस सहमे से पत्ते की 
सुकोमल गोद में
कुछ पलों की उम्र ले कर
जीता है हर उस पल को 
हो हो कर प्रफुल्लित, प्रमुदित 
मोती की सी चमक-दमक लेकर
देखता है चहुँ ओर निखिल विश्व को
लौटता है फिर से भोर में
अपने उसी उन्मुक्त आकाश में
कल फिर लौटने के लिये
इसी तरह..

रामनारायण सोनी
११.०१.२२

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