मैं व्यर्थ ही में
अर्थ ढूँढता रहा
मौसम के मिजाज में
पवन के स्पर्श में
भूरे बादलों की नमी में
शाखों पर उभरती कोंपलों में
वेणु के स्वर रंध्रों में
परन्तु
मेरे प्रियतम!
तुम तो...
स्पंदित मिले
मेरे हृदय की वीथियों में
रमे हुये पोर पोर में
आच्छादित रस ग्रन्थियों में
प्रवाहित होते कण कण में
उच्छवास में, निःश्वास में
श्वास में, प्रश्वास में
कौंध जाते हो प्रिय
फिर तो...
विस्तार पा जाते हो तुम
अन्तस के आकाश से
बाहर के निस्सीम संसार तक
मौसम के निजाज में,
पवन के स्पर्श में,
बादलों की नमी में
नवाङ्कुरित कोपलों में
वेणु के अनुनाद में
व्यष्टि से समष्टि तक
तुम ही तुम, बस
रामनारायण सोनी
१३.०२.२२
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