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Monday, 21 February 2022

एक तू ही तू

ओ मेरे!
परम प्रिय परमात्मा!
देखा है आज मैंने
फिर से एक बार नई नजर से
कुछ अलग ही तरह से
सूर्य की आभा और प्रकाश को
पत्तों के रंग और सुन्दर आकार को
तड़ाग को और तैरती बतखों को
हिमालय और बर्फ में उबलते तप्तकुण्ड को
आकाश को और टँकी आकाशगंगाओं को
महसूस हुआ तू फूल में और खुशबू में
पवन में और प्राणों में
अलग-अलग, विविध-विभिन्न
संच्छिन्न और विच्छिन्न
कहाँ कहाँ और कहाँ नहीं 
यत्र तत्र सर्वत्र
मेरे भीतर-बाहर भी
एक तू ही तू! बस तू ही तू!!

रामनारायण सोनी
२२.२.२२



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