तुम कहते हो
ओ! काली कलूटी रात!!
काले अंधेरों से भरी हो तुम!
लेकिन यही है वह रात
जो दर रोज खोलती है
अपनी विशाल बाहें,
समा लेती है उसमें
सूरज और रोशनी उसकी
खोलती है नये द्वार और पटल
कि तुम देख सको
झिलामिलाते नक्षत्रों को,
या उन चकोरों का
दूधिया आकाश, चाँद
और उसकी चाँदनी भी
सो सको उसकी
विश्राम भरी गोद में
अपनी थकन और पीड़ा
वहीं कहीं, उसी में छोड़ आये हो तुम!
तुम्हें फिर लौटा देगी
फिर तुम्हारा सूरज और वही रोशनी
यह काली कलूटी
तुम्हारी माँ ही की तरह
रामनारायण सोनी
१५.०२.२२
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