जिन्दगी के थान का वह टुकड़ा
जब से मुझे मिले तुम
इसे बुना, रंगा और ओढ़ा है हमने
चादर बन कर टँगा है अब
यादों, वादों, इरादों की खूँटियों पर
कभी कभी देखता था इसे
तो कभी तुम्हें भी संग संग
वक्त गुजरता रहा
आईना तब तब का वर्तमान कहता रहा
कभी आनन्द मिला
तो कभी तकलीफें चुभती रही
न हाथ छूटे, न भरोसे ही खूटे
और हम भी कभी कहीं न टूटे
तन मेरा तुम्हारा तपता, गलता गया
जुड़ गए कुछ सिक्के,
और जुड़ते चले गये कुछ मिट्टी के ढेर
प्रिये!
वक्त की सरकती सुइयों संग
तन का सौन्दर्य पतझड़ सा क्षरता गया
मन का सौन्दर्य नवांकुरों सा निखरता गया
तुम्हारे अन्तस का
यह अखूट सौन्दर्य
जमा पूँजी है हमारी ज़िन्दगी की तिजोरी में
और....
देखो! हम कितने अमीर हो गये हैं
देख रहा हूँ मैं अपने अन्तर्चक्षुओं से
तुम्हारे हृदयतल पर खड़े
विशालकाय प्रेम पर्वत को
ऐ मेरे प्रिय!
तुम कितने सुन्दर हो
रामनारायण सोनी
१७.०२.२२
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