मैं कृतज्ञ हो लूँ
कौन है वह ?
जो मेरे जीवन में
आज फिर सूरज सरका गया
कौन है वह?
जो मेरी भूख को पहिचान कर
धरती में दाने उगा गया
देखा नहीं किसी को मैंने
जो झाड़ों की लकड़ी में आग भरता रहा
देख कर इस धरती की प्यास को
दौड़ दौड़ कर कौन यह
उलीच लाया है समुन्दरों को
आखिर है कौन यह ?
जो धड़क रहा है मुझ में अहर्निश,
जानता हूँ कि एक दिन
घट जाऊँगा पूरा का पूरा मैं ही और सभी
फिर भी जोड़ जाता है
कुछ न कुछ रोज ही मुझ में, इन सब में
बिन माँगे, बिन पूछे, बिन बताए
दिखते कहीं भी नहीं
हजारों हाथ पैर और इशारे इसके
गर उसकी हवा खींच ली होती उसने
एक पल के लिये भी
तो बचता नहीं कोई भी
देखने के लिये कि बचा कौन है ?
उठाता, बिठाता, चलाता,
सुलाता, जगाता सब को, कौन है यह?
वक्त है कि जानूँ और महसूस करूँ
कृतज्ञ हो लूँ मैं
उस जगदात्मा, सर्वात्मा, परमात्मा का
रामनारायण सोनी
१८.०२.२२
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