Pages

Thursday, 3 March 2022

नेह की वही शपथ

चुभे शूल मेरे तलवों में
चीख तुम्हारी निकल गई थी
टीस हुई जब मेरे दिल में
साँस तुम्हारी विकल हुई थी
करुण हृदय की, कथा रुदन की तुम्हें सुनाने आया हूँ।
उसी नेह की वही शपथ फिर आज दिलाने आया हूँ।।

तोड़ गई सपने प्रभात में
ऊषा की स्वर्णिम किरणें ही
छोड़ गई रीती गागर सब
आशा पनिहारिन पनघट ही
इस एकाकी पथ पर उमड़े पतझार दिखाने आया हूँ।
उसी नेह की वही शपथ फिर आज दिलाने आया हूँ।।

यहीं कहीं अन्तस की गाँठें
खोल खोल रख डाली थी
नील नयन के नील गगन पर
पलकों की चादर डाली थी
टूटे बिखरे मन की किरचें, तुम्हें बताने आया हूँ।
उसी नेह की वही शपथ फिर आज दिलाने आया हूँ।।

आँगन आँगन बिरवा सूखे
पवन उकेरे कहीं जुन्हाई
चंचरीक की गुंजन लगती
होली के दिन बिरहा गाई
झुकी की नीम की टहनी पर, तुम्हें झुलाने आया हूँ।
उसी नेह की वही शपथ फिर आज दिलाने आया हूँ।।

रामनारायण सोनी 
३.३.२२









 ल्;

No comments:

Post a Comment