जागा अरुणिम भोर
अम्बर मेरे मन का आँगन जागा अरुणिम भोर प्रिये!
मानो ऊषा की चूनर ने जगती, पर रोली बिखराई
नव प्रभात में जैसे तुम बन, कमलकली हो मुसकाई
नयन मिले फिर हृदय जुड़े, जग की सब सुध बुध विसराई
रजनी जैसे अलस रही आँखों में भर भर अरुणाई
पल पल प्रमुदित अहसासों से भरे भरे हैं अहा हिये!
अम्बर मेरे मन का आँगन जागा अरुणिम भोर प्रिये!
मेरे स्वप्नों को पंख लगे अलि प्रसून मुख चूम रहा
लतिका के अवगुंठन में यह आँछ गाँछ है झूम रहा
अहसासों के अनुबन्धों में बन्धन का ना जिक्र रहा
मौन मुखर और मुँदे अधर ने संवेदी संवाद कहा
इस पल की छाया में हमने कितने कितने कल्प जिये!
अम्बर मेरे मन का आँगन जागा अरुणिम भोर प्रिये!
नयन बोलते नयनों से अहसास गुँथे से रह जाते हैं
नेह भरे मन के निर्झर ये झर झर कर झर जाते हैं
बिन पल्लव के रूखे टेसू नव प्रसून से भर जाते हैं
पद्मपत्र पर ठहरे जल कण पद्मराग हो जाते हैं
मत्थर बहती मदिर पवन ने कितने मादक गान किये!
अम्बर मेरे मन का आँगन जागा अरुणिम भोर प्रिये!
रामनारायण सोनी
२७.१२.२२
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