भोर का तारा
उधर वहाँ....
भोर का वह तारा
न रात का हो सका न दिन का
बीज बैठा रहा तिजोरियों में
कीमती नगीनों और सोने की गोद में
न मिट सका न उग ही सका
स्वाँति की बूँदें सागर में
सागर में ही फिर से घुल गई, मिल गई
सीपियाँ मिल न सकीं उन्हें
लोग आते रहे, जाते रहे
इन्ही राहों से...
और ये राहें कब से चल रही हैं
पर जाती नहीं हैं कहीं भी
देखती रहती हैं, पहुँचाती रहती हैं
अपनी जगह गड़ी गड़ी सी
रामनारायण सोनी
१५.११.२२
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