चन्द अशआर
जो था मैं कभी अब वो रहा मैं नहीं
जो हूँ आज वो किसी को पता नहीं
मुझसे नाराज हो के फिर तुम
खुद से ही खफ़ा होते हो क्यूँ?
ये माना कि इश्क में बंदिशें बहुत है
बन्दगी है इश्क इतना ये समझा हूँ मैं
इश्क दरिया है, इश्क राह जीने की
इश्क इबादत है इतना ही समझा हूँ मैं
जो बाजार में दिन भर ताले बेचते हैं
दुकानें उनकी भी कभी लुट जाती है।
बिसात पर तो खेल कई देखे हमने
बिन खेले भी बाजियाँ जीती जाती है
जो उनकी आँखों में बयां होते है
वो लफ्ज किताबों में कहाँ होते हैं।
ये गाती हैं गीत गज़लें और नज़्मे
जरा देख ! यहाँ कितने जहां होते हैं
रख लो आईने हजारों हज़ार लेकिन
हकीकत से नजरें मिलानी ही पड़ती है
जवाब फल से दिया जाता है पत्थर का
एक पेड़ होना भी बड़ा इम्तिहान है
वो खुद आईना धोता फिर रहा है
उसे अपने चेहरे पे शक हो रहा है
ये कैसा मलाल है उसकी समझ में
चिराग बुझा के अँधेरों से लड़ रहा है
सूरज का डूबना तय था और चाँद का सँवरना भी
शिद्दत से हो रहा था जिन्दगी का गुजरना भी.....
ये जिन्दगी तमन्नाओं का गुलदस्ता ही तो है
कुछ मुरझाती है तो कुछ चुभ जाती है।
रात की बात न कर वहाँ रोशन माहताब होता है
हर सक्ष अपनी हदों में खुद लाजवाब होता है
न मीरा की पीर हूँ, ना ही मैं कोई कबीर हूँ
फख्त शब्दों से इश्क है, ऐसा इक फ़कीर हूँ
मोहब्बत कोई धूल भी नहीं कि हवा में उड़ा दूँ
इश्क कोई जंग भी तो नहीं कि पत्थर से लड़ा दूँ
रात बहुत काली है, जालिम है, कैसे मैं ये भुला दूँ?
राह तेरी रोशन हो, आ मैं दिया दिल का जला दूँ
तुमने शायद मान लिया है अब ये पूरी तरह
कि साँसों का चलते जाना जिन्दगी है मेरी
अहसास, जज़्बात रख के भूल गए हो कहीं
मेरा इश्क सरहदों पार भी एक बन्दगी है मेरी
मेरी मुफलिसी अब हद को पार कर गई
जितनी भी पास थी मोहब्बत, खर्च हो गई
मेरी साँसे कुछ बेसुरी सी हो गई है सुनो तो ज़रा
मेरी धड़कने उधड़ सी गई हैं फिर बुनो तो जरा
बस्तियाँ, कारवाँ, वो लवाजमें कहीं गुम हो गए
जब से गए तुम, गुम हो गए हैं हम सुनो तो ज़रा
एक तुम ही तो थे जिसे बताता था मै राज-ए- दिल
अब न लोग सुनते हैं न ही मगरूर खामोशियाँ ही
तुम्हारे हिस्से का वह वक्त मैं अब भी खाली रखता हूँ
और सोने के पहले ही वे हसीं यादें सिरहाने रखता हूँ
इन्तज़ार में एक जिन्दगी कम पड़ जाएगी, मालूम ना था
वरना दो जिन्दगियाँ रब से माँग लेते, इसी जिन्दगी में
तुझे पता नही है, जिस्म से इश्क बड़ा होता है
न जलता है न गलता है न ही ये फ़ना होता है
इश्क जिन्दगी की रोशनी भी है ताजगी भी
ओढ़ लिहाफ जो इश्क के धागो से बुना होता है
थक जाती हैं आवाज और लफ़्ज भी थक जाते हैं
ढूँढते ढूँढते ।
अकेली एक अदद खामोशी ढूँढ लाती है कहीं से भी तुम्हे।।
उन लम्हों के उस शबनमी आब के क्या कहने
महसूस करता हूँ उसका कुदरती नूर अब भी
उन लम्हों में जो खुशबू थी न, वो तुम्हारी ही थी
कमबख्त महकते हैं उसी तरह याद में अब भी
गुजर जाती है हर रात वो उदासी लेकर तनहा तनहा
फिर उस दिन तो हम भी हुए थे यूँ ही तनहा तनहा
दिल से कहीं दूर निकल आए हैं हम यूँ ही तनहा तनहा
गुजरी हुई बारिश में हो जैसे एक बूँद तनहा तनहा
लिखा नहीं जा सकता उसे, जिसे महसूस किया
पढ़ा नही जा सका उसे, जिसे महसूस किया
पढ़ना लिखना तो सिर्फ कलम की घिसावट है
दिलों की जुबान वही समझे जिसे बस महसूस किया
चीजों और रिश्तों का फर्क समझना होगा
आसमां में घर नहीं होते जमीं पे उतरना होगा।
रोशनी उधार की लम्बी नही चल सकती है
अपने ही दिये से घर में उजाला करना होगा।।
हाँ आज तलक घर पे घर बदले हैं कई मैंने
पर बदला नही है ये तेरा दर मैंने कभी भी
तू जानता है ये कि यह घर-दर और ये दुनिया
बदलूँगा जब, तू भी न जान सकेगा कभी भी
मैं मिट्टी हूँ मिट्टी कहानी मेरी
कल भी यही थी कल भी रहूँगी
घड़ा हूँ, चिलम हूँ या सकोरा रहूँ
आखिर में फिर भी मैं मिट्टी रहूँगी
वक्त ने एक दिन कान में यह बुदबुदाया
ये चपल पल जो भी है अभी हाथ में मेरे I
कल मैं तुझे यह फिर ना लौटा सकूँगा
इसलिए चल हमकदम बन कर साथ मेरे।।
फानूस सी मेरी इस छत में टँगी है आशाएँ
सोने की जुगत करता हूँ तो शोर मचाती है।
फिक्रों की किताब सिरहाने रख कर मेरे
जिन्दगी एक खामोशी दे कर चली जाती है।।
रिश्तों को थोड़ा वक्त चाहिये निगाहों को फक्त तू चाहिये
रात की माँग में हैं सितारे बहुत मुझे रोशनी की किरन चाहिये।
है मय के पियाले निराले बहुत मुझे बस तुम्हारी नजर चाहिये
है बस्ती में लाखों नगीने भरे नहीं ये मुझे फक्त तू चाहिये।।
मैं अमीर था शहर में कई रईसों की तरह
एक दिन आई तकदीर कोई सक्ष लेकर।
मेरे हिस्से में था जो मेरे दिल का कवंल
चुरा लिया है मुझसे मेरा वो ही दगा देकर।।
जिन्दगी की अजब चाल कभी सबक एक देती है।
पूरी कायनात दे कर भी उस एक को छीन लेती है।।
रामनारायण सोनी
१.०८.२०२२
आरजू, इम्तिहान, मिन्नतें, मुश्किलें वो रास्ते हैं पगडण्डियाँ हैं।
चलते रहो, चलते रहो तकदीर से शायद कहीं वो मिल जाए।।
वो चाहत भी कोई चाहत है ? जो कहीं मोम सी पिघल जाए।
वो इश्क ही क्या जो फौलाद की बर्छियों से भी कट जाए।। '
सारा खार नमी में घुल कर नयनों से बह गया है।
क्या कहूँ, तेरी याद का हर पल मीठा हो गया है।।
अब मैं यही कहूँगा कि तेरी यादें बहुत मीठी है।।
मैं बहुत बोलता रहता हूँ यूँ ही वक्त बेवक्त तुमसे।
शायद सुनोगे फ़क्त मेरी आखरी खामोशी के बाद।
बावरा मन देखता है कई सपने
जो बने ही है टूटने के लिए
यूँ तो नजर का काम ही है देखना और देखते रहना
मगर एक उसे क्या देखा फिर तो उसी उसी को देखा
हर मुलाकात का अंजाम बिछड़ना ही होगा
जलेगा दीप कब तक, अंजाम अंधेरा ही होगा
माना कि एक दरिया बने और खूब बहे हो तुम
पर इक दिन चल के समुन्दर में ही गिरना होगा
मिरी दिल की जमी पर तुम क्या उगे
सारा जीवन सुहाना चमन हो गया
तुम्हें अब कुछ भी कहना शिकायत सा लगता है
हमें चुपचाप अपने अंदर ही रहना अच्छा लगता है
जमाना और अपने ही कहे जाने वाले ये सब लोग
जख्म देते हैं तेरे नाम से, ये दर्द मुझे अच्छा लगता है
जिन्दगी हारी हमने उम्र भर के इन्तेजार में
किया गुम खुद को तुम्हें अब तक ना पाया है
बड़ा अचरज दिखा हमको हमारे इस सफर मे
नही है पास वो फिर भी रगों में क्यूँ समाया है
इन आँखों की दहलीज पर अभी आँसू ठहरे हैं
पलकों के किनारों पे काजल के सख्त पहरे हैं
रिसते रहे इस रात में पुरजोर दिल के अंदर से
एक सागर है बसा सीने में इनसे ही तो उभरे हैं
रामनारायण सोनी
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मैंने लिखना छोड़ा तुझको,
पर तुम्हें भजना छोड दिया क्या ?
कब लडूँगा आखिर खुद से खुदी में,
मैं इस जंग में अपनी हार को
मुकम्मल तुम्हारी जीत महसूस करता हूँ
तुम्हारी दुआओं का असर
था जब तक उन दवाओं में
वे हजार गुना काम करती थी,
वे तो अब निरे चूने की टिकिया हो गई है
शहर छूटा, घर छूटा, छूटे पीछे यहाँ वहाँ कई लोग
न छूटी छबियाँ, पल, नजर में उस नजर का संजोग
मैंने कभी माँगा ही नहीं, रब ने दिया उसकी मर्जी
इस हाथ दिया उस हाथ लिया, जो किया उसकी मर्जी
आज मैं हूँ; मेरे सब हैं, कल हो न हो उसकी मर्जी
खाली हाथ आये फिर खाली हाथ चले उसकी मर्जी
किसी की मंजिल खोई होगी पर हमारे रास्ते ही खो गए हैं
कश्ती किनारे से कुछ ही दूर थी हम बे पतवार हो गए हैं
सदियाँ हम से ले लो खुशी खुशी कुरबान कर देंगे हम
सिर्फ कुछ लमहे ले के उनसे हम कितने कर्जदार हो गए हैं
एक बड़ी भीड़ से हमने भी जीत कर बता दिया
आखिर में हम हारे भी तो सिर्फ़ उस एक से हारे
समझ नहीं पाये हम कि क्या उसे फिकर नहीं
या कि उसके दिलो में बाकी मेरा जिकर नहीं
जागती खामोशियों में उफनती यादों के बीच
पलकों का इस तरह भींग जाना ही बदा था
जलजलों की शक्ल में कुछ इस तरह बिफरा
दिल का सैलाब था बाँध में सब्र के ये बँधा था
ये बेनाम रिश्ते हैं न देखों इन्हें हदों में बाँध कर
बने प्यार के हैं ये रिश्ते इन रिश्तों से प्यार कर
हसीं हमसफर देखे होंगे कई
बरसों चले साथ हमको देखा नहीं
आँखों के आँसू बहुत देखे होंगे
ये दिल कितना रोया है देखा नहीं
मैं एक लम्बे अर्से से एक जहान की तलाश में हूँ
जहाँ तुम रहो, हाँ सिर्फ तुम रहो और सिर्फ मैं रहूँ
तुमने उतर कर कई बार देख लिया है मेरे दिल में
होंगे कई वहाँ पर खास एक जगा है तुम्हारी दिल में
वे छोटी छोटी बाते गर हुई न होती मेरी जिन्दगी में
तो फिर ये बड़ी बात कभी हो नहीं पाती बन्दगी में
देखे हैं तूने खूबसूरत फूल चमन में कई किसम केछाले भरे, मिट्टी सने देखे न हाथ कभी बागबां के
बूँदे जो बिछड़ी थी समन्दर से ये तो सफर का आगाज है
उठना, चलना, गिरना फिर उसी ओर बहना खूबसूरत अन्दाज़ है
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देखे हैं तूने खूबसूरत फूल चमन में कई किसम के
छाले भरे, मिट्टी सने देखे हैं हाथ कभी बागबां के?
सतहों को देख कर गहराई न जान पाओगे
हर डूबने वाली लाश सतहों पर ही तैरती है
खो दिया खुद को तुझी में पा सकूँगा ना अब कभी
ये इश्क है कि इबादत है समझ सका न तब न अभी
किसे याद रखूँ किसे भूल जाऊँ कुछ भी सूझता नहीं।
आखिर होता यही है कि जिसे भूलना चाहूँ उसे भूलता नहीं।।
हदों में रह कर, बँधे से रह कर प्यार कभी हो नहीं सकता।
प्यार करना गलत नहीं पर गलती से प्यार हो नहीं सकता।।
बदल सका है कौन कभी इस आज को कल में
फिर आज को खो कर क्यों डूब रहे हम कल में।
जो बीत ही गया उसे दबा रहने दो उसी कल में
होगा कल कैसा हमारा ये तुम सोचना कल में।।
बेकार कोशिश करता रहा तेरी कहानी का किरदार बनने की।
मैं खुद अब अपनी अधूरी कहानी लिये घूमता हूँ गली गली।।
पुरानी सी किताब से मिली है एक कागज़ की वो कश्ती।
लिपटी मिली हैं उसमें ढेरों किलकारियाँ, मौज और मस्ती।।