क्या कभी तुम उन पलों को
भूल से भी जी रहे हो।।
देखता हूँ जब जिधर भी, क्यूँ दिखाई दे रहे हो
गीत की हर पंक्ति में, फिर फिर सुनाई दे रहे हो।
क्या अभी भी रंग के, छ्पके हिये में ही पड़े है
जो पिरोये प्यार के पल , क्या अभी भी उर धरे हो।।
देखता हूँ जब जिधर भी, क्यूँ दिखाई दे रहे हो।
क्या कभी तुम उन पलों को, भूल से भी जी रहे हो।।
मन कभी तन से निकल कर, दौड़ता उन वीथियों में
खिड़कियों की सीखचों से, झाँकता है झिल्लियों में।
क्या वही पगण्डियाँ सब, आज भी वैसी खड़ी हैं?
फुसफुसाती बतकही वे, क्या हृदय में ना गड़ी है?
देखता हूँ जब जिधर भी, क्यूँ दिखाई दे रहे हो।
क्या कभी तुम उन पलों को, भूल से भी जी रहे हो।।
याद है उन झुरमुटों के, बीच उगता चाँद वह भी
शीश का आभार काँधे, हो रहा महसूस अब भी।
केश के विन्यास टूटे थे, महज इक अंगुली से
पंखुड़ी थी महमहाती, जो बिखरती अंजुली से।।
देखता हूँ जब जिधर भी, क्यूँ दिखाई दे रहे हो।
क्या कभी तुम उन पलों को, भूल से भी जी रहे हो।।
जब लगी मेंहदी महावर, रंग राची थी हथेली
गीत, डफली, ढोलकों से, सज्ज थी तेरी हवेली।
पार इसके क्या सुना था? गीत मन में गुनगुना था
उत्सवों की भीड़ में भी, एक बस मैं अनमना था।।
देखता हूँ जब जिधर भी, क्यूँ दिखाई दे रहे हो।
क्या कभी तुम उन पलों को, भूल से भी जी रहे हो।।
क्या कभी नेपथ्य के फिर, अनकहे संवाद गूँजे?
क्या कभी उन मंदिरों के, देव जा कर फिर न पूजे?
याद हैं वह पुष्प मुझको, देव प्रतिमा से गिरा था
बाँट कर दो भाग मे जो, छिप छिपा हमने धरा था।।
देखता हूँ जब जिधर भी, क्यूँ दिखाई दे रहे हो।
क्या कभी तुम उन पलों को, भूल से भी जी रहे हो।।
तुम न थी तो कौन था वो, सब तरफ मेरे खड़ा था
देह की गठरी खुली तो, कौन उस यम से लड़ा था।
क्या तुम्हारी बज़्म में, चर्चे मेरे भी हो सके हैं
दौड़ तुम तक अब न होगी, उम्र के ये पग थके हैं।।
देखता हूँ जब जिधर भी, क्यूँ दिखाई दे रहे हो।
क्या कभी तुम उन पलों को, भूल से भी जी रहे हो।।
क्यूँ न जाने लग रहा है, जिन्दगी दो फाड़ सी है
एक मेरे साथ अब है, दूसरी मन में धँसी है।
(चुटकियों में चुक गई वो)
तब पलों में चुक गई जो, अब दिवा के स्वप्न सी है
गाँठ में बस याद की वो, इक इमारत भग्न सी है।।
देखता हूँ जब जिधर भी, क्यूँ दिखाई दे रहे हो।
क्या कभी तुम उन पलों को, भूल से भी जी रहे हो।।
रामनारायण सोनी
28.01.22
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