मौन लहरें हैं बुझी सी अनमने हैं घाट पनघट
एक दिन फिर टूट कर बन गया इतिहास नटखट।
थक गई नावें सभी ये हैं खुले मस्तूल फिर भी
लौटती पनिहारियाँ भी निज घरों को आज झटपट।।
जोहता है बाट किसकी प्यास नजरों में लिये यह
देह-मन गीले लिये यह कौन साहिल पर खड़ा है।
वह न लौटेगी कभी भी जान कर अनजान हो कर
अनगिनत मनुहार ले कर साँस साधे क्यों खड़ा है।।
बन्दिनी सब कामनाएँ आस सब सूली चढ़ी हैं
अर्चियाँ डूबी तिमिर में कुन्द सी साँसे पड़ी है।
साँझ से पहले अँधेरों ने पसारे पंख कारे
सज सँवर काँधे चढ़ी वो प्रीत की डोली खड़ी है।।
लेख गुम्फित है नियति के लिख गए आधी कहानी
प्राण की संचेतना क्यों छीन कर अधबीच मानी।
क्यों बिछी चादर प्रणय की जब बिखरना तय किया था
क्यों हृदय में प्रीत डाली फिर लिखी टूटी कहानी।।
देखता ही रह गया वह उठ रहे नभ के रवों को
कौंधती उन बिजलियों को और स्वप्नों के शवों को।
बिन अवध साकेत कैसा, प्राण बिन नर देह कैसी
यह धरा कैसी लगेगी तोड़ कर देखो ध्रुवों को।।
क्रन्दनों के गाँव में हम द्वार की दहलीज पर ही
अनमने आधे अधूरे और सूखे ओंठ ले कर।
घुट रहे मन प्राण अपने जो गये तिल तिल बिखर
भाग्य के अभिलेख कैसे ढा गया कैसा कहर।।
रामनारायण सोनी
१९.१२.२१
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