बचपन की गलियाँ
एक दिन मैंने
कहा खुद से खुदी को
चल चलें यह चकाचौंध छोड़
उन बचपन की प्यारी गलियों में
वहाँ पड़ी हैं अभी भी
खुद अपने हाथ की बनी कुछ पतंगे,
कुछ गिल्ली डंडे,
टायर सोल की एन्टिक चप्पलें,
साइकिल के पुराने उतरे टायर
चल! डंडे से दौड़ाएंगे उन्हें
एक तिलिस्मी संदूक में-
भरी पड़ी है यहाँ कुछ चीजें
शक्कर के हमेल, कांगनियाँ
और लकड़ी के रंगीन लट्टू
टाट के बने हुए वे झोले
जिनमें गिनती की तीन चार किताबें
एक लकड़ी की फ्रेम में स्लेट
खड़िया की कलम,
गोल्डन शाही की सूखी टिकिया,
निब वाली होल्डर कलम,
बरु वाली कलम मेरी
मिलेंगे कुछ सितोलिये के पत्थर
एक चौखाने में रखे कांच के वे कंचे
अभी वैसे के वैसे ही रंगीन हैं
और वे अनगढ़ पत्थरों के पाँचे
यादें कुछ कुछ धुंधली पड़ गई है मेरी
पर ऐ जिंदगी!
तेरी पीठ पर सब लदी हैं सब की सब
यहाँ एक चूड़ीदार बाजा भी हैं
भरी है इसमें मस्त
नाचते उछलते कूदते
बच्चों की मस्त मस्त किलकारियाँ
और सहगल के गाने
चल चलें इस दौड़ती दुनिया को छोड़
जिन्दगी की पहली दस माइलों में
धूल धक्कड़ भरी फाइलों में
उन कच्चे घरों में पक्के रिश्ते हुआ करते थे
भोर में खपरैलों में से उठता धुआँ
पनघट पर घिर्रियों की वे चूँ चकड़ की आवाजें
खजूर के पत्तों से बनी चटाई पर
धूप सेंकते दादी मां के आसपास बैठे
गली के प्यारे प्यारे वे बच्चे
ऐ जिंदगी! बहुत कुछ और भी लिखा है
फौलादी अक्षरों से तेरे दिल पर
तो, आ! चल चलें लौटकर
थोड़ा छ्पाक कर के कूद लें
कीचड़ भरे डोबरों में
सौंधियाती मेरी गाँव की माटी में
ऐ जिन्दगी! तू जरा ध्यान से सुन !
मैं ना सही
तू ही खेल आया कर
कभी कभी उन गोंईयों के साथ
देख जरा! गांव के बाहर
सती के ओटले पर
बिखरे हुए अनाज के "चूगे" पड़े हैं अभी भी
खड़ा है अभी भी वह बूढ़ा बरगद
सुबह शाम चहचाहट करते पंछी देखे हैं तूने!
घबरावे तू जब जब भी
इस घुटन और आपाधापी भरे वातावरण से
घूम आया कर बिना पूछे बिना कहे
बचपन की गलियाँ
रामनारायण सोनी
२८.१२.१९
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