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Friday, 28 January 2022

उम्र कलम की कच्ची है

उम्र कलम की कच्ची है
   नादानी इसकी सच्ची है

उम्र कलम की छोटी है यह
कुछ का कुछ कह जाती है
साफ नहीं बोली इसकी यह
कहते कहते तुतलाती है।
शाई केवल नीली ही थी
पर रंगों का संसार रचा है
जान नहीं बेजान भले है
भावों का अम्बार भरा है।।
   उम्र कलम की कच्ची है।
   नादानी इसकी सच्ची है।।

झुग्गी में मुनिया को रोते
देख सिसकने लगती है
हलकू की ठिठुरन देखे तो
खुद भी कँपने लगती है।
सहलाती पाँवों के छाले
मरहम हाथों से मलती है
लँगड़ाते शैशव को पकड़े
हौले हौले संग चलती है।।
   उम्र कलम की कच्ची है।
   नादानी इसकी सच्ची है।।

चूल्हे में न जली आग पर
पेट झुलसता है भूखों से
किलकारी मरते देखी जब
लल्ली की गुमसुम चीखों से।
यह मासूम कलम रोती है
उसके संग संग खोली में
मदद जुटाने दौड़ी जाती
माँग रही लटपट  बोली में।।
   उम्र कलम की कच्ची है।
   नादानी इसकी सच्ची है।।

जब से सुना किसी कुटिया में
लाल बहादुर जन्मा था
और कहीं पर एक कलाम का
वह कमाल का कर्मा था।
डायर का वह महाकाल भी
कुटिया में ही पला बढ़ा था
विष्णु गुप्त ने भारत माँ के
ग्वाला माथे एक मढ़ा था।।
    उम्र कलम की कच्ची है।
    नादानी इसकी सच्ची है।।

तब से दर दर भटक भटक
गुदड़ी, कुटिया ढूँढ रही है
ऐसे लाल कहीं मिल जाए
उन सपनों में झूल रही है।
इक दिन उम्र पकेगी इसकी
फिर इक नया सवेरा होगा
भारत माँ के भाल सजाने
फिर से कोई चितेरा होगा।।
    उम्र कलम की कच्ची है।
    नादानी इसकी सच्ची है।।

इसमें बाबा की झिड़की है
और अम्मा का प्यार भरा

रामनारायण सोनी
१.१.२२

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