Friday, 30 June 2023
Tuesday, 27 June 2023
दो घूँट प्यार के ला देना
Monday, 26 June 2023
गीत सृजन के गावेंगे
Thursday, 22 June 2023
दो दिये दो जिन्दगी
Sunday, 18 June 2023
स्मृतियों में सदा जियूँगा
स्मृतियों में सदा जियूँगा
Friday, 16 June 2023
घुल जाएँ हम
Thursday, 15 June 2023
ऐ जिन्दगी
Sunday, 11 June 2023
चुभते हुए ख्वाब
Saturday, 10 June 2023
कस्तूरी के मृग
Friday, 9 June 2023
तुम न आए
मन का संस्पर्श
Wednesday, 7 June 2023
नदी के बेचारे पत्थर
Monday, 5 June 2023
रंगकर्म का सूत्रधार
Saturday, 3 June 2023
रंग मेरी संकल्पना के
Thursday, 1 June 2023
पाँच कविताएँ
यह मेरा इन्दौर है
यह मेरा इन्दौर है, यह राष्ट्र का सिरमौर है
जो कदम हमने चले पदचिह्न बनते वे गये।
गढ़ लिये प्रतिमान हमने कर्म से सब नित नये।।
युग प्रवर्तन के नये संकल्प भर कर मुट्ठियों में
स्वच्छता के ध्वज तले एकत्र जन गण सब हुए।।
यह मेरा इन्दौर है, यह राष्ट्र का सिरमौर है
शहर के बच्चे बड़े सहभागिता इसमें किये हैं
स्वच्छता के सूत्र सारे विश्व ने हम से लिये हैं
पञ्च तत्वों के प्रदूषण खत्म कैसे हों शहर से
जन-प्रशासन ने हमारे लक्ष्य हाथों में लिये हैं।।
यह मेरा इन्दौर है, यह राष्ट्र का सिरमौर है
कान्ह और यह सरस्वती स्वच्छ नीरा हो बहेगी
छत्रियाँ तट पर विरासत की कथाएँ खुद कहेंगी।
राजवाड़ा है हृदय में मराठा-शौर्य का इतिहास गाता
रंग की पिचकारियाँ उल्लास की गाथा कहेगी।।
थी कभी यह राजधानी सूत की और सूतमिल कीयह मेरा इन्दौर है, यह राष्ट्र का सिरमौर है
थी श्रमिक को बाँटती आजीविका परिवार भर की
कौन जाने इस नगर को क्यो नजर काली लगी
छिन गया वैभव श्रमों का छिन गई थी शान्ति जन की
यह मेरा इन्दौर है, यह राष्ट्र का सिरमौर है
पर शहर जीवट हमारा फिर नई अंगड़ाई ले ली
कृषि उपज और मण्डियों ने राह अपनी खोज डाली
फिर जगा व्यापार का इक नया अभिसार ले कर
शहर हो स्मार्ट सूरत फिजाँ मिल कर बदल डाली।
यह मेरा इन्दौर है, यह राष्ट्र का सिरमौर है
चल शिखर की श्रृंखलाएँ हर क्षेत्र में अपनी बनाएँ
सीखने यह विश्व सारा हैं ऑंगने इन्दौर आए
भोग छप्पन बाफलों संग आएँ और सब जीम जाएँ
मालवी की मालवा की मधुरता सब को चखाएँ।।
यह मेरा इन्दौर है, यह राष्ट्र का सिरमौर है
हम सभी मिल कर इसे फिर राष्ट्र का गौरव बनाएँ।।।
रामनारायण सोनी
२८.०५.२३
Thursday, 25 May 2023
मैं ही तो हूँ
जाने क्या हुआ मुझे
समय की तेज बहती धार के संग
सहज रूप से बहते बहते
यकायक मैं स्थिर हो गया हूँ
गुलमोहर का सुर्ख रंग
रगों में लहू बन कर उतर गया है
पुतलियों पर काई अपनी हरीतिमा की
दरियाँ बिछा गईं है
पैरों तले उल्टी खड़ी मेरी परछाईं
देख देख हँसती है मुझ पर
कि तुम छोटे से गुलंगे थे, अब
सिर पर खड़ी सफेद घाँस तक आ गये हो
तन की मलमली चादर पर
उभर आई है सिलवटों की पगडण्डियाँ
हाथों की अंजुरी में पड़ी रेखाएँ
भविष्य के चरम बिन्दुओं के
निकट आ कर ठिठक सी गई हैं
कह रही है बस अतीत की
उलझी सुलझी कथाएँ हरबोलों की तरह
ठहरी ठहरी सी मेरी इस ठठरी में
मन चौकडियाँ भरता है
अट्टालिकाओं और झरोखों से
झाँक झाँक कर
रोता है, हँसता है, उदास होता है
पढ़ता है जीवन के सप्त सर्ग
देखो! जाने क्या हुआ मुझे
समय की तेज बहती धार के संग
सहज रूप से बहते बहते
यकायक मैं स्थिर हो गया हूँ
हाँ यह मैं ही हूँ!
रामनारायण सोनी
२६.०५.२३
ठीक ही तो है
Tuesday, 23 May 2023
पत्थर में फूल खिलाएँ
Tuesday, 25 April 2023
मेरा काम तो है पुकार
Monday, 10 April 2023
अर्चना पञ्च तत्वों की
अर्चना पञ्च तत्वों की
तुम ही तो आधार हो
व्यष्टि के, समष्टि के, जीव के, जगत के
हे पवन !
ठहरी सी क्यों हो मलय की वीथियों में
चन्दन की सुगन्ध बाट जोह रही है तुम्हारी
इन्हें जन जन तक पहुँचा दो
प्राणवह, गन्धवह, वेगवाहिनी,
विश्व व्यापिनी, अमित बलवान हो तुम !
प्राणदा हो तुम!
हे जल!
तुम्हारी कल कल करती धाराओं को कहो !
प्रपातों से गिर कर धुआँ-धुआँ हो कर देखो !
इस निसर्ग को सौंदर्य से भर क्यों नहीं देती ?
भर दो नद -नदियों को अपने पावन जल से
इस दग्ध जीवन की प्यास मिटाने की सामर्थ्य है
केवल तुम में ही
कह दो इन्हे जगजीवन ले कर बहो ! .
हे दीप्त अग्नि!
ऋत्विज वेदियों को समिधाओं से
सज्जित कर प्रतिक्षा कर रहे हैं तुम्हारी ही
ऋचाएँ सर्वदिक् अनुनादित हो रही हैं
अपनी उत्तप्त जिव्हाओं में भर कर
पहुँचा दो आहुतियाँ देवों को
हे नचिकेत! हमारे भोज्य को
सुपाच्य और आरोग्यप्रद बनाओ!
हे मातृभूमि!
तुम पालक, धरित्री हो!
और जीवन दायिनी हो !
हम पर प्रसन्न हो कर हम पर अनुग्रह करो!
कृतार्थ करो हम पुत्रों को
हे असीम अम्बर!
इधर यहाँ भी, वहाँ भी हो तुम...
दिवस के प्रकाश में छोटे हो जाते हो
अँधेरे का उदय होते ही
तुम में उगती है अकाशगंगाएँ
और यहाँ...
इधर मेरे घर के कक्ष में
यह रात कहती है
हे दीपक! आओ
और मेरी एक कोने में
अपनी रोशनी लेकर बैठ जाओ
यहाँ किसी के मिलन की घड़ी आ रही है
साक्षी बनो उस महापर्व के
रामनारायण सोनी
१५/११/२२
महायोग:- मूलाधार से विशुद्धि तक
श्रीमद्भगवद्गीता
भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च।
अहङ्कार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा।।7/4।।
अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम्।
जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत्।।7/5।।
Friday, 17 March 2023
जिन्दगी सँवार लो
जिन्दगी सँवार लो
झरने की झझराती वो आवाज,
सूखे पत्तों की ये सरसराहट,
बादलों की वो गरज,
बूँदों की टिप-टिप
मिमियाते मेमने,
लगती होगी तुम्हें महज आवाजें
पर मुझे तो लगता है
जैसे प्रकृति इनके माध्यम से बोलती है।
अपने कान नहीं,
अपना ध्यान लगा कर सुनो जरा!
ये देवदार की ध्वजाएँ,
रोमावली हैं अल्पनाएँ
नदियाँ हैं शिराएँ,
अलकें हैं लताएँ
श्रृंग शिखर हैं परिपुष्ट भुजाएँ
धरा के धाम पर गगन का वितान है
जैस जगती के मण्डप में
साकार हो रहा सृष्टि का विधान है
प्रदर्श नहीं महादर्श है
प्रकृति का मनोरम आधान है
खुले नयनों से निहार लो जरा!
जीवन छोटा सा है
सँवार लो जरा
रामनारायण सोनी
१८.०३.२३
Thursday, 16 March 2023
महाविनाश की ओर
Wednesday, 15 March 2023
आत्मा का आह्लाद
आत्मा का आह्लाद
गूँगा जो बोलता है,
बहरा जो सुनता है,
बिना आँख के भी जो देखता है
वह भाषा है, बोली है, जुबान है
वह केवल 'मौन' है
वह सन्नाटा है, वह निस्पन्द है।
फुसफुसाहट, शोर, दहाड़, गर्जन
बहुत सुने होंगे, पर
सुनो इस मौन को
यह 'अनहद नाद' है
शरीर का नहीं, मन का नहीं
आत्मा का आह्लाद है
रामनारायण सोनी
13.03.23
Wednesday, 1 March 2023
तुम्हारी मौजूदगी
नूतन नव विहान
Tuesday, 21 February 2023
छोड़ दिया लिखना मैंने
दीप मेरे
दीप मेरे!
तुम हृदय में सजे क्या
स्वप्न जागे, रात जागी
फिर तिमिर की प्यास भागी
आत्मबोधी प्रखर प्रज्ञा
क्षणिक जग यह स्मरण है
प्राण की संचेतना का
चिन्मयी यह विस्तरण है
आ चलें हम!
रश्मियों का प्राश कर लें!
Sunday, 19 February 2023
तुम शाश्वत सत्य सनातन हो
हे नाथ तुम्हें ना भूल सकूँ!
हे नाथ तुम्हें ना भूल सकूँ!
मरुथल में हो ढूँढ रहा प्यासा मृग जैसे बूँद बूँद
दिग दिगन्त में फैली है जग की तृष्णा की घनी धुन्ध
इन्द्रिय के घोड़े थके थके, काँधे आगे को झुके झुके
इस लोभ मोह के चक्कर में, आशा के टूटे सभी बन्ध
अब तेरी याद सताती है
आँखें भींग भींग जाती है
इस मन में मैल भरा इतना सागर में खार भरा जितना
इस पाप पुण्य की गठरी में है माल भरा मैंने कितना
पर सुमर नहीं पाया मैं तीनों पन बीत गये रीते
इस कलुष भरे जीवन को ही मैं रहा पालता इतना
अब तेरी याद सताती है
आँखें भींग भींग जाती है
इस हाड़ मांस के पिंजर को सारी ही उम्र सजाया हूँ
रहा बीनता कंकर पत्थर हीरा जनम गवाँया हूँ
द्वार द्वार और नगर नगर में भटक रहा था मैं अब तक
तुमने उपकार किये इतने मैं समझ अभी पाया हूँ
अब तेरी याद सताती है
आँखें भींग भींग जाती है
मन की अन्धी गलियों में तुम रोशन हो कर छा जाओ
अपनी करुणा से हे प्रभु! तुम मेरी झोली भर जाओ
तम के काले घन ने घेरा है दुःख दर्दों ने डाला डेरा
हे नाथ! तुम्हें ना भूल सकूँ अन्तर में ऐसे रम जाओ
अब तेरी याद सताती है
आँखें भींग भींग जाती है
हे प्राण कण्ठ में रुके हुए वाणी अवरुद्ध हुई जाती
कानों तक आई आवाजें फिर वापस लौट कहीं जाती
पर सिर्फ तेरी पदचाप सुनूँ यही मेरीअभिलाषा है
हे प्रणतपाल! हे दीनबन्धु! मैं हूँ बस तेरा आराती
अब तेरी याद सताती है
आँखें भींग भींग जाती है
रामनारायण सोनी
१६.०२.२३
Sunday, 12 February 2023
जो मिल गया सम्हाल ले
Monday, 6 February 2023
क्या देखते हो?
Saturday, 4 February 2023
चीटियाँ हैं ये
Monday, 16 January 2023
अपनी धरती, अपना घर
*अपनी धरती, अपना घर*
धरती पर देखने वालों ने
कल आसमान देखा
उड़ते चढ़ते कई रंग देखे
पेंच देखे, खेंच देखी
जमे देखे, उचके देखे
उम्मीदों की डोर पर
अरमान भी देखे, निश्वास भी देखे
कुछ ने बस देखा ही देखा
काटता कोई हो, कटता कोई हो
पर कई थे व्यर्थ की लूट में
इधर से उधर दौड़ते लोग।
उन माँजों का क्या
जो काटने आये गला
हिमालय के उस पार से
नीले गीले आसमान से
वे तैरती रंगीन परियाँ
एक दिन के सफर से
फिर लौट आईं अपने घर
याने फिर अपनी धरती पर
रामनारायण सोनी
१६.०१.२३
Monday, 9 January 2023
संग सदा तू रहता है
संग सदा तू रहता है
मैं प्रणाम करता हूँ इन हिम आच्छादित शिखरों को
वन्दन करता हूँ सूरज की अरुणिम इन किरणों को।
धरता अपना शीश मही पर इसका अर्चन करने को
अभिनन्दन पहुँचे मेरा उन कल कल करते झरनों को।।
कण कण इस भूतल का मेरे प्रभु का यह मन्दिर है
नभ में मण्डित चाँद सितारे मन्दिर के ये शिखर हैं।
तड़ित मजीरा मेघ गर्जना घनन घनन करता घन है
मन मयूर का नर्तन मेरा यह घर आँगन सुन्दर है।।
रोम रोम में बसी चेतना मुझमें तू ही नित रमता है
सूखे पत्तों के परदे में भीषण दावानल छिपता है।
जनम मरण के बीच हमारा जीवन कैसे चलता है
नहीं दीखता फिर भी तो तू संग सदा ही रहता है।।
रामनारायण सोनी
१०.०१.२३
Monday, 26 December 2022
जागा अरुणिम भोर प्रिये
Thursday, 22 December 2022
शब्द ब्रह्म
शब्द ब्रह्म
मैं शब्द हूँ
मैं उस अनन्त अक्षर से मण्डित हूँ
मैं अमर हूँ, मैं समर हूँ
मैं सुधा हूँ, मैं गरल हूँ
गूँज हूँ, अनुगूँज हूँ, स्पन्द हूँ
मैं वज्र भी हूँ, पुष्पों सा कोमल भी हूँ
नेपथ्य में बोये गए कुछ शब्द बीज
उगते, विकसते हैं जगत के रंगमंच पर
अपने अर्थ, भाव, संदेश और कथ्य ले कर
मेरी बिखरन होती है सतरंगी
रक्त सी लाल, सत्य सी श्वेत
निस्सीम व्योम सी नील,
पाण्डु सी पीत, राम-कृष्ण सी श्याम
वसन्त सी अभिराम,
लता सी हरित ललाम
जब जब मैं उतरता हूँ कोरे कागज पर
किसी के अन्तस से निकल कर
बाहर बिखरता हूँ साकार हो कर
बनाता हूँ चित्र, धँसता हूँ तुम्हारे भीतर
बैठ जाता हूँ शूल लेकर मन की कोंख में
चुभता हूँ, सालता हूँ कभी जीवन भर
लेप हूँ, मरहम हूँ, तसल्ली भी मैं ही तो हूँ।
मैं ओज का उद्घोष हूँ
शान्ति का दूत हूँ, स्मृतियों का महाकोष हूँ
प्रणय का गीत हूँ, प्रिय का मन मीत हूँ
पावन ऋचा हूँ, जीवन का उद्गीत हूँ
मैं नाद हूँ, मैं गीत हूँ, मैं प्रगीत हूँ
मैं माँ की ममता हूँ, पिता की गोद हूँ
आर्त की पुकार और वीरों में क्रोध हूँ
तुम्हारे मन में हूँ, आकाश में भी हूँ
चलता हूँ विद्युत की तरंगों पर
कभी हवा के परों पर बैठ कर
वहाँ सें यहाँ, यहाँ से वहाँ, जाने कहाँ कहाँ
मैं बीज हूँ
सृजन भी मैं, जीवन भी मैं, ध्वंस भी हूँ मैं
मैं ब्रह्म हूँ। शब्द ब्रह्म।।
रामनारायण सोनी
२०.१२.२२
Wednesday, 21 December 2022
प्राण की वंशी
तुम न आए! प्राण की वंशी अभी निष्प्राण है
साँझ सोई इस अलसती रात की मृदु गोद में
तारिकाएँ श्वेत गंगा की पलक से झाँकती है
नील सर के नील शतदल पत्र पर हैं राह तकते
मन्द बहती है पवन पर फिर भी लगता त्रासती है
प्यास अपने कण्ठ ले कर चिर वियोगन जागती है
तुम न आए! प्राण की वंशी अभी निष्प्राण है
झुरमटों से हैं महकते बाग, बन, उपवन मनोरम
श्वेत, रक्तिम, पीत पुष्पी लिग्गियाँ पथ में टँगी है
चुलबुले कलहंस सर में संग भ्रमरों की ये सरगम
कूकती कोयल किनारे मधुमास जैसे माँगती है
बिन तुम्हारे इस हृदय में शूल जैसी सालती है
तुम न आए! प्राण की वंशी अभी निष्प्राण है
रामनारायण सोनी
२०.१२.२२
Tuesday, 20 December 2022
भीतर झाँको जरा
भीतर झाँको जरा
तुम ही बताओ
क्या वो तुम ही हो?
जो कभी तुम थे।
या फिर तुम्हें लगता है
'मैं' जो लगता था कभी
'मैं' अब वैसा नहीं लगता
सुनो सुप्रिये!
रूहों की जात, औकात, रंग
कभी भी नहीं बदलता।
अपने भीतर पलट कर देख लो जरा।
क्या तुम वही नहीं हो?
रामनारायण सोनी
२७.०९.२२
भोर का तारा
मुक्तावली
Friday, 21 October 2022
स्वप्न से समाधि तक
Wednesday, 19 October 2022
दो पल की पहिचान
Sunday, 16 October 2022
एक महीन रिश्ता
एक रिश्ता जो आदत बन गया
एक आदत जो लत हो गई
एक लत जो छोड़े नहीं छूटती
रिश्ता जो मंजिल नहीं सफर था
सफर जो ख्वाहिशों की पगडण्डियों से गुजरा
पगडण्डी जो इस दिल से उस दिल को
महीन, मुलायम, पवित्र रिश्ते से जोड़ती है
रामनारायण सोनी
१७.१०.२२
Wednesday, 12 October 2022
सागर किनारे तुम्हें सौंपता हूँ
Sunday, 2 October 2022
पीर मेरी मधुबनी
इस हृदय की भित्तियों पर जो लिखे कड़वे कथानक
खोजता क्यों बावरा मन दंश की पीड़ा अचानक।
शुष्क अधरों पर निगोड़ी प्यास ही ठहरी हुई है
दौड़ते मृग शावकों को छल रहा मरु ज्यों भयानक।।
पीर है अभ्यर्थना प्रिय प्रीति की यह मधुबनी है।।
क्यों तिमिर के इस निलय में रोशनी को ढूँढते हो
रेत के पदचिन्ह गिन कर जिन्दगी को बूझते हो।
रिस रहे थे व्रण बिचारे क्या उन्हें तुम देख पाये
जान कर भी बेतुके ये प्रश्न तुम क्यों पूछते हो?
पीर है अभ्यर्थना प्रिय प्रीति की यह मधुबनी है।।
मर चुकी संवेदना अब ओस की कहती कहानी
उपवनों की गन्धवह थी यह पवन होती मसानी।
उम्र के माथे लिखी जो सिलवटें कहती जुबानी
क्रन्दनों के इस नगर में खोजते हो तुम रवानी।।
पीर है अभ्यर्थना प्रिय प्रीति की यह मधुबनी है।।
फिर कोई आ कर व्रणों पर खार सारा धर गया है
जो दबे थे तह तले फिर पल हथेली धर गया है।
रागिनी क्यों ढूँढते हो बाँस की इस पोंगरी में
सांझ का प्रहरी सितारा इस सुबह में मर गया है।।
पीर है अभ्यर्थना प्रिय प्रीति की यह मधुबनी है।।
मैं अकेला ही भला हूँ यह पीर मेरी संगिनी है
मैं रहा अनुचर उसी का वह मेरी जो स्वामिनी है।
पीर मीरा की प्रणय था पीर में नवजात सुख था
पीर है अभ्यर्थना प्रिय प्रीति की यह मधुबनी है।।
पीर है अभ्यर्थना प्रिय प्रीति की यह मधुबनी है।।
गीत पीड़ा के स्वयं ही गान अपने गा रहा है
उन सुरों की वेदना में सुख समझ सुख पा रहा है।
इस हृदय को रास आई पीर संग मेरी सगाई
भित्तियों के वे कथानक फिर हृदय दोहरा रहा है।।
पीर है अभ्यर्थना प्रिय प्रीति की यह मधुबनी है।।
रामनारायण सोनी
३.०९.२२
Saturday, 1 October 2022
संस्पर्श
Friday, 30 September 2022
तुम ही तो थी
Saturday, 24 September 2022
बटुआ
एक ऐयारी का !
जादुई बटुआ है मेरे पास
बहुत सारे पुड़ हैं उसमें
खोल कर दिखाता हूँ
एक तिलिस्म तुम्हें
रख रख्खे हैं इसमें मैंने
तरह तरह के पल
खूबसूरत पल, आनन्द के पल,
जिन्दगी के अलग अलग मोड़ के पल,
मिलन के बिछड़ने के पल।
कुछ पल ऐसे भी हैं
जिनका साया आज तक भी
पीछा नहीं छोड़ रहे
और वे जिन्दगी के सफेद कागजों
को ढँकने लगता है।
रामनारायण सोनी
२५.०९.२२
Thursday, 22 September 2022
दूधिया हो लें
दूर! बहुत दूर!
बहुत बहुत दूर हो तुम!!
लगता है चाँद के पास हो तुम!!
नहीं नहीं! तुम्हारे पास एक वो चाँद है
और एक तुम्हारा, यानी मेरा अपना भी
तुम से अमीर हूँ मैं, मेरी किस्मत है कि
दो दो चाँद है मेरे पास
अब रोशनी भी है और शबाब भी
सनम भी और माहताब भी
रुकोगी तुम तो रुक जाएँगे चाँद भी
यों ही रोके रहो रात को
चलो दूधिया हो लें हम
बहुत सारे थे, वे तारे, देखनहारे
चाँद ने उन्हें छुपा दिया है आकाश में
चलो कोई खूबसूरत सा गीत गा लें हम
ये रात, ये चाँदनी, ये दिलकश नज़ारा!
ये समा मिलेगा फिर न दोबारा!!!
रामनारायण सोनी
२२.०९.२२
Tuesday, 20 September 2022
सिलवटों के पार से
सिलवटों के पार से कुछ अनकही बातें सुनाऊँ
दर्द ने लिक्खे कसैले घाव आओ मैं दिखाऊँ
जिस लड़कपन को कभी काँधे बिठाया था
भूख खा कर खुद उसे माखन खिलाया था
खोल गठरी से व्यथा की यह कथा तुमको बताऊँ
सिलवटों के पार से कुछ अनकही बातें सुनाऊँ
सिलवटों के पार से कुछ अनकही बातें सुनाऊँ
इक सलोना स्वप्न हमने प्यार से ऐसा संजोया
देव पूजे, भात , धोक दे कर सिर नवाँया
तब कहीं जा कर हमारी गोद में शिशु एक पाया
सो सके वह नींद भर इसलिये खुद को जगाया
खर्च कर अपनी जवानी पालने बचपन झुलाया
उम्र की बीती कहानी आओ तुमको मैं सुनाऊँ
सिलवटों के पार से कुछ अनकही बातें सुनाऊँ
स्वप्न अपने रहन रख कर सब खुशी उसकी खरीदी
पाँव के छाले छुपा कर जूतियाँ ला कर उसे दी
था सजा आँगन हमारा गूँजती किलकारियों से
खर्च डाले जो जमा थे ढूँढ कर अल्मारियों से
हार थक कर लौटते थे दिन दिहाड़ी के कड़े थे
उस थकन की पीर को मैं अब तुम्हें कैसे बताऊँ
सिलवटों के पार से कुछ अनकही बातें सुनाऊँ
फिर समय नें बदल करवट तीव्र तेवर थे दिखाए
थे जिन्दगी की ओढ़नी में पेच टाटों के लगाए
वे उँगलियाँ, हाथ, माथा चूमते थे लाड़ से हम
हाय यह हत भाग्य कैसा हो गए कितने पराए
झुर्रियों से ढूँढ कर मुस्कान मुह पर कैसे लाएँ
छूटते दर और टूटते घर की कथा कैसे सुनाऊँ
सिलवटों के पार से कुछ अनकही बातें सुनाऊँ
देखता हूँ दृश्य, आश्रम द्वार पर नजरें गड़ी थी
कीमती उस कार से काय कृश उतरे खड़ी थी
जर्जराती जिल्द में हो कामायनी जैसे मढ़ी थी
जिन्दगी बस खार लेकर आँसुओं से वह झड़ी थी
तुम इसे सन्यास का बस नाम दे कर चुप रहोगे
उस हृदय की मर्मभेदी चीख मैं तुम को सुनाऊँ
सिलवटों के पार से कुछ अनकही बातें सुनाऊँ
रामनारायण सोनी
२०.०९.२२
तिनके सा मैं
सारस से पाँखी हम
बातों ही बातों में तुमने-
कितने ही पृष्ठ पलट डाले
चमक उठे वातायन
विविध रंग वाले
लिक्खी थी मधुर मधुर
वे शहदीली रातें
सारस से पंख खोलकर
उड़ने की बातें
यादों के अम्बर में
फगुनी टेसू क्या दहका है ?
मौसम का पोर पोर महका है
रामनारायण सोनी
२०.०९.२२
Monday, 19 September 2022
मेरा उपवन बुला रहा
ओ नभ के उड़ते पांखी
मेरा उपवन बुला रहा है
थोड़ा पंखों को दो विराम
मेरा उपवन बुला रहा है
तुम पहुँचोगे जगह जहाँ पे
प्यारा गाँव हुआ करता था
उसे शहर ने निगल लिया है
एक चौपाल हुआ करता था
ओ नभ के उड़ते पांखी
मेरा उपवन बुला रहा है
आम, नीम, बड, पीपल की
ठण्डी छाँव घनी रहती थी
उनके शव तक नही बचे है
अब सन्नाटा पसर रहा है
ओ नभ के उड़ते पांखी
मेरा उपवन बुला रहा है
सुखद नीड़ था जहाँ बनाया
तिनके तक अब नहीं मिलेंगे
वे मधुर गान तोता मैना के
सुनने को ना कहीं मिलेंगे
ओ नभ के उड़ते पांखी
मेरा उपवन बुला रहा है
ताल तलैया सूख चुके हैं
प्याऊ बस इतिहास हुई है
पथ में छाँव बिछाता बादल
तक भी आना छोड़ रहा है
ओ नभ के उड़ते पांखी
मेरा उपवन बुला रहा है
दूर देश के प्रिय प्रवासी
मीलों तुम उड़कर आए हो
मालव की माटी और पानी
अब कंकरीट वन उगा रहा है
ओ नभ के उड़ते पांखी
मेरा उपवन बुला रहा है
कोयल और पपीहे की तो
आवाजें सब बिदा हुई है
नगर गाँव में हवा प्रदूषित
बोतल में जल बिक रहा है
ओ नभ के उड़ते पांखी
मेरा उपवन बुला रहा है
रामनारायण सोनी
११.०८.२२
सेवा का हवन कुण्ड
सेवा का हो हवन कुण्ड और हम समिधा हो जाएँ
अगन बने फिर लगन हमारी सर्व समर्पित हो जाए।
तन-मन तप कर संकल्पों का मंगल सूत्र बँधाएँ
शुद्ध भाव की अरणी ले कर पावन ज्योति जगाएँ।।
इस समष्टि का हर कण कण सेवा में आहुतियाँ देता
नदियाँ बहती सूरज तपता पवन प्राण ले क्यों बहता।
सागर अपना पानी दे कर इस जग में जीवन धरता
अम्बर अपने महा उदर में सृष्टि अनेकों क्यों भरता।।
इनमें से कोई भी अपना मूल्य कर्म का नहीं माँगता
इस निर्बाध क्रिया में वह अपना नियम नहीं लाँघता।
ये सब सेवा का प्रकल्प ले आदिकाल से लगे हुए हैं
फिर भी रहते मौन सदा ये ना कोई उपदेश बाँटता।।
सेवा के इस महायज्ञ से महामारियाँ भी हारी हैं
मानवता की प्रतिरक्षा में सेवा ही सब से भारी है
हर सेवक नर में नारायण आ कर स्वयं उतरते हैं
इसीलिये कष्टों के पल में भी तो यह सेवा जारी है
आओ प्रिय इस महायज्ञ में आहुतियाँ अपनी डालें
हो वेद ऋचाओं का उच्चारण तब हम हाथ स्रुवा लें।
अपनी धरा गगन अपना है मन में सेवा दीप जला लें
पीड़ित मानवता की सेवा में तन मन प्राण लगा लें।।
रामनारायण सोनी
१९.०९.२२
शूल और फूल
बहुत प्रयास किये तुम ने भी मैंने भी
न यादें मिटी, न पीछे छूटी रेखाएँ
न वे पल, न ही वे वाकिये
आँगन के बिरवे की टहनियों से झड़ते रहे
बहारें, फूल पत्तियाँ और खुशबू
पर उन गुदाज़ यादों के शूल
चख लेते हैं लहू के स्वाद को
कितना सुकून है इस दर्द और चुभन में
मैं उतना ही प्यार करता हूँ
इन निर्मम शूलों से
जितना करता रहा हूँ
फूलों से, पत्तों से, पंखुड़ियों से
रामनारायण सोनी
१७.०९ .२२
महसूस किया बस तूने
सुनना एक बात है
समझना एक और बात है
पर महसूस करना
सब से अलग और सबसे खास बात है
मुझे सुना भी है, समझा भी है
जमाने भर के लोगों ने
सिर्फ वो है जो महसूस करता है मुझे
रामनारायण सोनी
०९.०९.२२
Saturday, 17 September 2022
सृष्टि है यह ईशमय
नदिया बहती है क्यों
बहती हुई जीवन की यह नदी !
बहना उसका अकेला नहीं है
हरेक पल बहता है !
जल कण की तरह
रास्ते का हर घाट !
भाग्य ले कर खड़ा है..
तमाम स्वार्थ की कश्तियाँ खड़ी हैं
लंगर डाले इस नदी की छाती पर
अपने लिये जल है जीवन इस का
दुनिया के लिये जीवन है जल इस का
बहना है कर्म इसका
बहते रहना ही है धर्म इसका
उद्भव से अवसान तक
रामनारायण सोनी
१७.०९.२२
ज़िंदगी ज़िंदगी
जिन्दगी सिर्फ साढ़े तीन हर्फों की है
कब से लिखे जा रहा हूँ इस को
जिसको ज यानी जन्म से शुरू किया था
बचपन इस में इ की मात्रा लगाने में
याने इल्म पाने में खर्च हो गई
कई अच्छे मकाम जो थे रास्ते में
कुछ बरस इसके माथे बिंदी चढ़ाने में गुजरे
और मैं देख ता ही रह गया
जिदगी की दौड़ती रेल गाड़ी में बैठा रहा मैं
बाहर गाँव, नगर, नदी, पहाड़ और
द-से शुरू होने वाली यह दुनिया
सब के सब दौड़ते दिखाई दिये
ग से गुजरते गए कई मोड़
और जुड़ते गए कई जोड़
हॉफती रही यह फिर भी दौड़ती ही गई
द्वन्द्वों के बीच कौंधती रही कहीं कहीं
हास्य की निसर्ग रेखाएँ
तमस भरे बादलों में बिजलियों की तरह
भाग्य के परिताप से पीछे रह गए
वे रिश्ते, वे लोग, वे राहें, वे पगडण्डियाँ
जानती है जिन्दगी की नदी कि
पास ही कहीं है समुन्दर का वो मुहाना
जिसे छोर कह लो, मृत्यु कह लो
चिर विछोह कह लो
संज्ञा और नाम इस के कई है
हर वर्तमान के काल के भाल पर
अतीत की मुहर जरूर लगती है
जिंदगी प्रमेय नहीं हो सकती
इसमें दो और दो हमेशा चार नहीं होते...
रामनारायण सोनी
१७.०९.२२
शूल और फूल
बहुत प्रयास किये तुम ने भी मैंने भी
न यादें मिटी, न पीछे छूटी रेखाएँ
न वे पल, न ही वे वाकिये
आँगन के बिरवे की टहनियों से झड़ते रहे
बहारें, फूल पत्तियाँ और खुशबू
पर उन गुदाज़ यादों के शूल
चख लेते हैं लहू के स्वाद को
कितना सुकून है इस दर्द और चुभन में
मैं उतना ही प्यार करता हूँ
इन निर्मम शूलों से
जितना करता रहा हूँ
फूलों से, पत्तों से, पंखुड़ियों से
रामनारायण सोनी
१७.०९ .२२
Tuesday, 13 September 2022
परिपूर्ण ब्रह्म
Monday, 12 September 2022
मृदुल स्पर्श
कितना फर्क है इन में
Tuesday, 6 September 2022
आँसू डाकिया भी है
यमुना एक खोई नदी गंगा में
Sunday, 4 September 2022
खुदी में खुद की तलाश
Friday, 2 September 2022
आओ सभी आईना पहन लें
खामोश चिट्ठी
तुम्हारे नाम से शुरू मेरे नाम से खत्म मेरी चिट्ठी
इस बीच कोई लिखा हाल न खबर ये मेरी चिट्ठी
हर बार फिर भी तुमने सिद्दत से पढ़ी मेरी चिट्ठी
मेरे दिल से तेरे दिल का नाजुक जोड़ मेरी चिट्ठी
हो गया होगा महसूस उन लफ़्जों और जुबान का
जो बयान करती है जो खामोशियाँ मेरी चिट्ठी
इन्हीं खामोशियों ने फिर गज़ल गाई नज़्म गाई
बिना बोले भी कितना बोलती है ये मेरी चिट्ठी
रामनारायण सोनी
२.०९.२२
Tuesday, 30 August 2022
गर मैं पागल होता
गर मैं पागल होता
गर मैं पागल होता तो
बस तू होता और मैं होता
प्याले पर नाम तेरा होता
तो विष भी वह अमृत होता
आँसू धार बही सब खातिर
पर एक बूँद तुझे चढ़ जाती
मेरे अगले पिछले सारे
जनम जनम के अघ धो जाती
गर मैं पागल होता तो
बस तू होता और मैं होता।।
लौटा दे वह भोला बचपन
जब तू संग रमा करता था
तुतलाती लटपट बानी तू
जो हर बार सुना करता था
मुझे जिताने खातिर नटखट
खुद तू हार लिया करता था
रोता था मैं जब जब गिर कर
बढ तू थाम लिया करता था
गर मैं पागल होता तो
बस तू होता और मैं होता।।
मैंने कभी नहीं माँगा कुछ
सब देता है, तेरी मर्जी
चाहे दे इस हाथ अभी ये
फिर लौटा ले, तेरी मर्जी
जनम मरण है हाथ तुम्हारे
यह जीवन भी, तेरी मर्जी
बाहर भीतर तू ही तू है
इतना सा गर समझा होता
गर मैं पागल होता तो
बस तू होता और मैं होता।।
जर्जर मेरी नाव हुई है
तट भी छूट गये हैं सारे
धार तेज है भँवर बड़े हैं
तन भी मन भी दोनों हारे
बिन पतवार बही जाती है
मेरा भरोसा है कि तुम ही
मातु पिता या बन्धु बनोगे
भव से तारोगे बस तुम ही
गर मैं पागल होता तो
बस तू होता और मैं होता।।
रामनारायण सोनी
२८.०८.२२
Saturday, 27 August 2022
छाया कैसी कैसी
तुम चलो ! छाया चलती है
तुम रुको! छाया रुकती है
पर विज्ञान ने इसे मोडीफाय कर दिया
जब तुम चले, जब तुम रुके
जस का तस लेन्स के उस पार
अंकित कर के रख लिया
अब छाया बोलती है, चलती है
नाचती है , गाती है,
हँसाती, रुलाती है, गुदगुदाती है
कभी कागज पर छप कर
कभी पर्दे पर उतर कर
कभी मोनीटर के स्क्रीन पर
छाया अब प्रतिच्छाया नहीं रही
रामनारायण सोनी
२४.०८.२२
साहिल पर क्यों बैठे हो
सुना है! थी तो वह बेजान लाश
जो चार सौ किलोमीटर तक तैर गई
बिना किसी साँस के, बिना किसी नाव के
बिना किसी साथ के, बिना किसी ताव के
तुम हो कि साहिल पर डरे डरे से
खड़े हो भारी भरकम लंगर डाल के
साहिल पर लगी नाव ले कर
पर लाशें उतर गई उफनते दरिया में
क्योंकि लाशें डरती नहीं
मौत से, आँधियों से, भवरों से
पानी में मगरों से और भीमकाय अजगरों से
अपनों से, परायों से, दोपायों से, चौपायों से
तीरों और तलवारों से
कह रही है वह कहानी, अपनी ही जुबानी
जिन्दगी को हार कर भी मैं
मीलों तक चलती ही रही
मेरी व्यथा में रोने वालों तक से नहीं कही
जल कर हो जाऊँ, मिल जाऊँ भले खाक में
पर साहस की, शौर्य की
एक कहानी अपने नाम जरूर लिख जाऊँगी
रामनारायण सोनी
२६ .०८.२२
ऐ विराट नभ!
ऐ!नभ ऐ! विराट
नभ विशाल! ऐ नभ विराट
तेरी गाथा है अमित अपार
तुझ में बसते है सूर्य चाँद
क्या नाप सका कोई प्रसार
तू हर खाली घट में रहता
तुझ में ही तो सारे घट हैं
धरती मानव जीव जन्तु की
जीवन सरिता का पनघट है
अम्बर तुम इतने विराट
क्षीर समुद्र कहाते हो तुम
ग्रह नक्षत्र तारिकाओं के
आश्रय दाता हो केवल तुम
तुम असीम तुम महाशून्य
तुम पंच तत्व में भी प्रधान
सृष्टि उदर में बसी तुम्हारे
है इसीलिये महिमा महान
नारायण तुझ क्षीर सिन्धु में
शैया शेष लिये बसते हैं
सप्त लोक और भुवन भी
तेरे आश्रय में रहते हैं
तुम में बादल और पखेरू
हैं आजाद विचरते रहते
पवन प्राण और गन्ध लिये
तुम में ही नित बहते रहते
गरिमा लघिमा और महिमा
इन शक्ति के तुम हो धर्ता
बिन तेरी इस महिमा के यह
सृष्टि सृजन ना सम्भव होता
रामनारायण सोनी
२८.०८. २२
गगन तुम्हारे अमित रूप
गगन तुम्हारे अमित रूप
गगन तुम्हारे अमित रूप, पर हर रूप निराला है
दिन में कितना उजला है, और रजनी में काला है।
सघन घनों को धरते हो तो, श्यामल तुम हो जाते हो
स्वच्छ सलोने हो कर तुम, नील गगन कहलाते हो।
गगन तुम्हारे अमित रूप, पर हर रूप निराला है।।
प्राची में जब अरुणिम ऊषा, सूरज ले कर आता है
वह कनक थाल तब तब, कुंकुम रोली बिखराता है।
कभी टाँक लेते हो तन में, तारक हीरे माणक मोती
कभी चाँदनी घोल धरा को, पहनाते दुधिया धोती।
गगन तुम्हारे अमित रूप, पर हर रूप निराला है।।
बने क्षितिज पे नील कटोरा, तान रहे हो तुम वितान
इसमें जग ने हर दिन देखे, नित नूतन नव-नव विहान।
कभी चंदोवा तनता नभ में रजत थाल सज जाती है
अमृत की गागर फिर भर कर धरा धाम नहलाती है।
गगन तुम्हारे अमित रूप, पर हर रूप निराला है।।
रामनारायण सोनी
२७.०८.२२
Thursday, 25 August 2022
कहानी लिख जाऊँगी
सुना है! थी तो वह बेजान लाश
जो चार सौ किलोमीटर तक तैर गई
बिना किसी साँस के, बिना किसी नाव के
बिना किसी साथ के, बिना किसी ताव के
तुम हो कि साहिल पर डरे डरे से
खड़े हो भारी भरकम लंगर डाल के
साहिल पर लगी नाव ले कर
पर लाशें उतर गई उफनते दरिया में
क्योंकि लाशें डरती नहीं
मौत से, आँधियों से, भवरों से
पानी में मगरों से और भीमकाय अजगरों से
अपनों से, परायों से, दोपायों से, चौपायों से
तीरों और तलवारों से
कह रही है वह कहानी, अपनी ही जुबानी
जिन्दगी को हार कर भी मैं
मीलों तक चलती ही रही
मेरी व्यथा में रोने वालों तक से नहीं कही
जल कर हो जाऊँ, मिल जाऊँ भले खाक में
पर साहस की, शौर्य की
एक कहानी अपने नाम जरूर लिख जाऊँगी
रामनारायण सोनी
२६ .०८.२२
बारिश की बूँदें
अब क्या लिखूँ मै
Wednesday, 24 August 2022
कैसी ये खुशफहमियाँ
Tuesday, 23 August 2022
मुझे मैं क्यूँ पसन्द हूँ
ड्राफ्ट
Thursday, 18 August 2022
चन्द अशआर
चन्द अशआर
जो था मैं कभी अब वो रहा मैं नहीं
जो हूँ आज वो किसी को पता नहीं
मुझसे नाराज हो के फिर तुम
खुद से ही खफ़ा होते हो क्यूँ?
ये माना कि इश्क में बंदिशें बहुत है
बन्दगी है इश्क इतना ये समझा हूँ मैं
इश्क दरिया है, इश्क राह जीने की
इश्क इबादत है इतना ही समझा हूँ मैं
जो बाजार में दिन भर ताले बेचते हैं
दुकानें उनकी भी कभी लुट जाती है।
बिसात पर तो खेल कई देखे हमने
बिन खेले भी बाजियाँ जीती जाती है
जो उनकी आँखों में बयां होते है
वो लफ्ज किताबों में कहाँ होते हैं।
ये गाती हैं गीत गज़लें और नज़्मे
जरा देख ! यहाँ कितने जहां होते हैं
रख लो आईने हजारों हज़ार लेकिन
हकीकत से नजरें मिलानी ही पड़ती है
जवाब फल से दिया जाता है पत्थर का
एक पेड़ होना भी बड़ा इम्तिहान है
वो खुद आईना धोता फिर रहा है
उसे अपने चेहरे पे शक हो रहा है
ये कैसा मलाल है उसकी समझ में
चिराग बुझा के अँधेरों से लड़ रहा है
सूरज का डूबना तय था और चाँद का सँवरना भी
शिद्दत से हो रहा था जिन्दगी का गुजरना भी.....
ये जिन्दगी तमन्नाओं का गुलदस्ता ही तो है
कुछ मुरझाती है तो कुछ चुभ जाती है।
रात की बात न कर वहाँ रोशन माहताब होता है
हर सक्ष अपनी हदों में खुद लाजवाब होता है
न मीरा की पीर हूँ, ना ही मैं कोई कबीर हूँ
फख्त शब्दों से इश्क है, ऐसा इक फ़कीर हूँ
मोहब्बत कोई धूल भी नहीं कि हवा में उड़ा दूँ
इश्क कोई जंग भी तो नहीं कि पत्थर से लड़ा दूँ
रात बहुत काली है, जालिम है, कैसे मैं ये भुला दूँ?
राह तेरी रोशन हो, आ मैं दिया दिल का जला दूँ
तुमने शायद मान लिया है अब ये पूरी तरह
कि साँसों का चलते जाना जिन्दगी है मेरी
अहसास, जज़्बात रख के भूल गए हो कहीं
मेरा इश्क सरहदों पार भी एक बन्दगी है मेरी
मेरी मुफलिसी अब हद को पार कर गई
जितनी भी पास थी मोहब्बत, खर्च हो गई
मेरी साँसे कुछ बेसुरी सी हो गई है सुनो तो ज़रा
मेरी धड़कने उधड़ सी गई हैं फिर बुनो तो जरा
बस्तियाँ, कारवाँ, वो लवाजमें कहीं गुम हो गए
जब से गए तुम, गुम हो गए हैं हम सुनो तो ज़रा
एक तुम ही तो थे जिसे बताता था मै राज-ए- दिल
अब न लोग सुनते हैं न ही मगरूर खामोशियाँ ही
तुम्हारे हिस्से का वह वक्त मैं अब भी खाली रखता हूँ
और सोने के पहले ही वे हसीं यादें सिरहाने रखता हूँ
इन्तज़ार में एक जिन्दगी कम पड़ जाएगी, मालूम ना था
वरना दो जिन्दगियाँ रब से माँग लेते, इसी जिन्दगी में
तुझे पता नही है, जिस्म से इश्क बड़ा होता है
न जलता है न गलता है न ही ये फ़ना होता है
इश्क जिन्दगी की रोशनी भी है ताजगी भी
ओढ़ लिहाफ जो इश्क के धागो से बुना होता है
थक जाती हैं आवाज और लफ़्ज भी थक जाते हैं
ढूँढते ढूँढते ।
अकेली एक अदद खामोशी ढूँढ लाती है कहीं से भी तुम्हे।।
उन लम्हों के उस शबनमी आब के क्या कहने
महसूस करता हूँ उसका कुदरती नूर अब भी
उन लम्हों में जो खुशबू थी न, वो तुम्हारी ही थी
कमबख्त महकते हैं उसी तरह याद में अब भी
गुजर जाती है हर रात वो उदासी लेकर तनहा तनहा
फिर उस दिन तो हम भी हुए थे यूँ ही तनहा तनहा
दिल से कहीं दूर निकल आए हैं हम यूँ ही तनहा तनहा
गुजरी हुई बारिश में हो जैसे एक बूँद तनहा तनहा
लिखा नहीं जा सकता उसे, जिसे महसूस किया
पढ़ा नही जा सका उसे, जिसे महसूस किया
पढ़ना लिखना तो सिर्फ कलम की घिसावट है
दिलों की जुबान वही समझे जिसे बस महसूस किया
चीजों और रिश्तों का फर्क समझना होगा
आसमां में घर नहीं होते जमीं पे उतरना होगा।
रोशनी उधार की लम्बी नही चल सकती है
अपने ही दिये से घर में उजाला करना होगा।।
हाँ आज तलक घर पे घर बदले हैं कई मैंने
पर बदला नही है ये तेरा दर मैंने कभी भी
तू जानता है ये कि यह घर-दर और ये दुनिया
बदलूँगा जब, तू भी न जान सकेगा कभी भी
मैं मिट्टी हूँ मिट्टी कहानी मेरी
कल भी यही थी कल भी रहूँगी
घड़ा हूँ, चिलम हूँ या सकोरा रहूँ
आखिर में फिर भी मैं मिट्टी रहूँगी
वक्त ने एक दिन कान में यह बुदबुदाया
ये चपल पल जो भी है अभी हाथ में मेरे I
कल मैं तुझे यह फिर ना लौटा सकूँगा
इसलिए चल हमकदम बन कर साथ मेरे।।
फानूस सी मेरी इस छत में टँगी है आशाएँ
सोने की जुगत करता हूँ तो शोर मचाती है।
फिक्रों की किताब सिरहाने रख कर मेरे
जिन्दगी एक खामोशी दे कर चली जाती है।।
रिश्तों को थोड़ा वक्त चाहिये निगाहों को फक्त तू चाहिये
रात की माँग में हैं सितारे बहुत मुझे रोशनी की किरन चाहिये।
है मय के पियाले निराले बहुत मुझे बस तुम्हारी नजर चाहिये
है बस्ती में लाखों नगीने भरे नहीं ये मुझे फक्त तू चाहिये।।
मैं अमीर था शहर में कई रईसों की तरह
एक दिन आई तकदीर कोई सक्ष लेकर।
मेरे हिस्से में था जो मेरे दिल का कवंल
चुरा लिया है मुझसे मेरा वो ही दगा देकर।।
जिन्दगी की अजब चाल कभी सबक एक देती है।
पूरी कायनात दे कर भी उस एक को छीन लेती है।।
रामनारायण सोनी
१.०८.२०२२
आरजू, इम्तिहान, मिन्नतें, मुश्किलें वो रास्ते हैं पगडण्डियाँ हैं।
चलते रहो, चलते रहो तकदीर से शायद कहीं वो मिल जाए।।
वो चाहत भी कोई चाहत है ? जो कहीं मोम सी पिघल जाए।
वो इश्क ही क्या जो फौलाद की बर्छियों से भी कट जाए।। '
सारा खार नमी में घुल कर नयनों से बह गया है।
क्या कहूँ, तेरी याद का हर पल मीठा हो गया है।।
अब मैं यही कहूँगा कि तेरी यादें बहुत मीठी है।।
मैं बहुत बोलता रहता हूँ यूँ ही वक्त बेवक्त तुमसे।
शायद सुनोगे फ़क्त मेरी आखरी खामोशी के बाद।
बावरा मन देखता है कई सपने
जो बने ही है टूटने के लिए
यूँ तो नजर का काम ही है देखना और देखते रहना
मगर एक उसे क्या देखा फिर तो उसी उसी को देखा
हर मुलाकात का अंजाम बिछड़ना ही होगा
जलेगा दीप कब तक, अंजाम अंधेरा ही होगा
माना कि एक दरिया बने और खूब बहे हो तुम
पर इक दिन चल के समुन्दर में ही गिरना होगा
मिरी दिल की जमी पर तुम क्या उगे
सारा जीवन सुहाना चमन हो गया
तुम्हें अब कुछ भी कहना शिकायत सा लगता है
हमें चुपचाप अपने अंदर ही रहना अच्छा लगता है
जमाना और अपने ही कहे जाने वाले ये सब लोग
जख्म देते हैं तेरे नाम से, ये दर्द मुझे अच्छा लगता है
जिन्दगी हारी हमने उम्र भर के इन्तेजार में
किया गुम खुद को तुम्हें अब तक ना पाया है
बड़ा अचरज दिखा हमको हमारे इस सफर मे
नही है पास वो फिर भी रगों में क्यूँ समाया है
इन आँखों की दहलीज पर अभी आँसू ठहरे हैं
पलकों के किनारों पे काजल के सख्त पहरे हैं
रिसते रहे इस रात में पुरजोर दिल के अंदर से
एक सागर है बसा सीने में इनसे ही तो उभरे हैं
रामनारायण सोनी
🌹🌹🌹🌹💐🌹💐
मैंने लिखना छोड़ा तुझको,
पर तुम्हें भजना छोड दिया क्या ?
कब लडूँगा आखिर खुद से खुदी में,
मैं इस जंग में अपनी हार को
मुकम्मल तुम्हारी जीत महसूस करता हूँ
तुम्हारी दुआओं का असर
था जब तक उन दवाओं में
वे हजार गुना काम करती थी,
वे तो अब निरे चूने की टिकिया हो गई है
शहर छूटा, घर छूटा, छूटे पीछे यहाँ वहाँ कई लोग
न छूटी छबियाँ, पल, नजर में उस नजर का संजोग
मैंने कभी माँगा ही नहीं, रब ने दिया उसकी मर्जी
इस हाथ दिया उस हाथ लिया, जो किया उसकी मर्जी
आज मैं हूँ; मेरे सब हैं, कल हो न हो उसकी मर्जी
खाली हाथ आये फिर खाली हाथ चले उसकी मर्जी
किसी की मंजिल खोई होगी पर हमारे रास्ते ही खो गए हैं
कश्ती किनारे से कुछ ही दूर थी हम बे पतवार हो गए हैं
सदियाँ हम से ले लो खुशी खुशी कुरबान कर देंगे हम
सिर्फ कुछ लमहे ले के उनसे हम कितने कर्जदार हो गए हैं
एक बड़ी भीड़ से हमने भी जीत कर बता दिया
आखिर में हम हारे भी तो सिर्फ़ उस एक से हारे
समझ नहीं पाये हम कि क्या उसे फिकर नहीं
या कि उसके दिलो में बाकी मेरा जिकर नहीं
जागती खामोशियों में उफनती यादों के बीच
पलकों का इस तरह भींग जाना ही बदा था
जलजलों की शक्ल में कुछ इस तरह बिफरा
दिल का सैलाब था बाँध में सब्र के ये बँधा था
ये बेनाम रिश्ते हैं न देखों इन्हें हदों में बाँध कर
बने प्यार के हैं ये रिश्ते इन रिश्तों से प्यार कर
हसीं हमसफर देखे होंगे कई
बरसों चले साथ हमको देखा नहीं
आँखों के आँसू बहुत देखे होंगे
ये दिल कितना रोया है देखा नहीं
मैं एक लम्बे अर्से से एक जहान की तलाश में हूँ
जहाँ तुम रहो, हाँ सिर्फ तुम रहो और सिर्फ मैं रहूँ
तुमने उतर कर कई बार देख लिया है मेरे दिल में
होंगे कई वहाँ पर खास एक जगा है तुम्हारी दिल में
वे छोटी छोटी बाते गर हुई न होती मेरी जिन्दगी में
तो फिर ये बड़ी बात कभी हो नहीं पाती बन्दगी में
देखे हैं तूने खूबसूरत फूल चमन में कई किसम केछाले भरे, मिट्टी सने देखे न हाथ कभी बागबां के
बूँदे जो बिछड़ी थी समन्दर से ये तो सफर का आगाज है
उठना, चलना, गिरना फिर उसी ओर बहना खूबसूरत अन्दाज़ है
🌹🥀🔥🥀🌹🥀🔥
देखे हैं तूने खूबसूरत फूल चमन में कई किसम के
छाले भरे, मिट्टी सने देखे हैं हाथ कभी बागबां के?
सतहों को देख कर गहराई न जान पाओगे
हर डूबने वाली लाश सतहों पर ही तैरती है
खो दिया खुद को तुझी में पा सकूँगा ना अब कभी
ये इश्क है कि इबादत है समझ सका न तब न अभी
किसे याद रखूँ किसे भूल जाऊँ कुछ भी सूझता नहीं।
आखिर होता यही है कि जिसे भूलना चाहूँ उसे भूलता नहीं।।
हदों में रह कर, बँधे से रह कर प्यार कभी हो नहीं सकता।
प्यार करना गलत नहीं पर गलती से प्यार हो नहीं सकता।।
बदल सका है कौन कभी इस आज को कल में
फिर आज को खो कर क्यों डूब रहे हम कल में।
जो बीत ही गया उसे दबा रहने दो उसी कल में
होगा कल कैसा हमारा ये तुम सोचना कल में।।
बेकार कोशिश करता रहा तेरी कहानी का किरदार बनने की।
मैं खुद अब अपनी अधूरी कहानी लिये घूमता हूँ गली गली।।
पुरानी सी किताब से मिली है एक कागज़ की वो कश्ती।
लिपटी मिली हैं उसमें ढेरों किलकारियाँ, मौज और मस्ती।।
क्यों उदास हूँ मैं ?
क्यों उदास हूँ मैं
बड़ी अजीब सी बात है
मैं इसलिये उदास हूँ कि!
बहुत दिनों से मुझसे कोई लड़ा नहीं
मेरे कानों ने बहुत दिनों से
'तुम पागल हो!' सुना नहीं
एक अर्से से इन सूखी आँखों से
खारा पानी बहा नहीं
चाय के इस एक प्याले से
चाय पी नहीं साइड बदल कर
मैं उदास हूँ कि !
वे खिड़कियाँ अब बात नहीं करती
मन्दिर की वे सीढ़ियाँ मुझ से पूछती हैं
कि तुम अकले ही क्यों आये हो?
छतों पर कबूतरों की सी
गुटरगूँ अब सुनाई नहीं देती
मैं उदास हूँ कि!
इस किनारे की नाव
जब से गई है उस पार
वह कभी लौटी ही नहीं
आँगन का पीपल अपने पत्तों की
पीटता रहता था तालियाँ
तुम्हारी खिलखिलाहट देख कर
बरस भर अब पतझड़ रहता है उस पर
मैं उदास हूँ कि!
कूकती कोयल के सुर
भेद जाते है मन, प्राण, हृदय को!
अनमनी मुंडेर पर
नहीं सुनी काँव काँव अर्से से
बूढ़े बरगद की झूलती जड़ों पर
अब भी चिपके हैं वे
हाथों के वे मृदुल स्पर्श तुम्हारे
रक्तकण्ठी हरे कच सुग्गे दोहराते हैं
पुकारे गए हमारे तुम्हारे नामों, सम्बोधनों को
क्या यादों के तुम्हारे उस नीड़ में
उन पलों के पंछी कभी लौट कर नहीं आते?
रामनारायण सोनी
१७.०८.२२
Tuesday, 16 August 2022
किसे ढूँढता है यह सक्ष
😳 किसे ढूँढता है यह सक्ष 😢
बिल्लोरी काँच की ऐनक के
पीछे से एक जोड़ी नम आँखें
धुन्दियाती, चुन्धियाती आँखें
नीले विस्तीर्ण अम्बर पर छितरे
श्वेत श्याम बादलों में गड़ जाती है
सहसा उभरता है बेटे का बचपन
खिलखिलाता रेशमी एहसास सा
तभी वक्त की बहकी हवाएँ चली
बादल बिखर गए गल गल कर
टूटी तन्द्रा, पसर गई नीरवता
जिन्दगी तार-तार, निराधार
शून्य ही शून्य चहुँ ओर
खाली आसमान अनन्त अपार
कितना खाली खाली संसार
बचपन जो उसकी गोद खेला
अपनी काँपती उंगलियोँ में अब
उस बेटे की छुअन को ढूँढता है
उम्र से झुके इन काँधों पर
बैठे मचलते उस बचपन के
महसूस करता है भार को
तब ये काँधे जवान थे
हाथों में भी कर्म के संधान थे
अब अहसास का बोझ भी असह्य है
शिराएँ मन्द हैं, धमनियाँ निष्पन्द हैं
इधर तन गला गला, मन बुझा बुझा
बातें सिर्फ फजाएँ ही सुनती है
आशाएँ अपने हाथों सिर धुनती हैं
फिर भी आशीष को उठे हाथ
दिशाओं में फैल जाते हैं
खाली आसमान अनन्त अपार
कितना खाली खाली संसार
किस कदर ये पीढ़ियाँ बदल गई
संस्कृति पूरी की पूरी निगल गई
संवेदनाएँ श्मसान में और
श्मसान चौराहे पर खड़ा है
विश्व-गुरू की आकाँक्षा, आदर्श लिए
राष्ट्र कितना बेसुध पड़ा है
अतीत की पोटली से सोनचिरैया
चीख चीख दुनिया को दिखाते हैं
स्वर्ण कूड़े के बदले बिक चुका है
चिरैया बेजान खिलौना हो चुका है।
जानती नहीं पीढ़ियों की ये भेड़ें
एक दिन इसी गर्त में वे ही गिरनी है।
खाली आसमान अनन्त अपार
कितना खाली खाली संसार
रामनारायण सोनी
