Thursday, 21 April 2022
Tuesday, 19 April 2022
बिखर गए सब सपने
क्या करूँ
मुक्तक
Monday, 18 April 2022
कोविड १९
जर्द पत्तों पर लिखूँ क्या
गत बसन्तों की इबारत।
खण्डहर के ईंट रोड़े
कह रहे उनकी शहादत।।
आज स्वर में भैरवी के
क्यों रुदन की कर्कशा है।
रोशनी के झुरमुटों में
मुर्दनी है, दुर्दशा है।।
इन प्रलय के विषधरों की
मृत्युमय फुँफकार गूँजी।
चढ़ गये शूली निरे जन
कुछ बची ना गाँठ पूँजी।।
कोई कहता यह नियति के
कायदे बस सन्तुलन के।
या कि सौदागर बड़े वो
मौत लिखते हाथ जिनके।।
रामनारायण सोनी
२२।३।२०२०
Friday, 15 April 2022
यादें जाती नहीं
Thursday, 14 April 2022
कोहरों का शहर
फूँस की दीवार
कोई क्या कहेगा?
Tuesday, 15 March 2022
हम तुम
Thursday, 3 March 2022
नेह की वही शपथ
जानता हूँ मैं
जानता हूँ मैं
भूलते भूलते थक गई हो तुम!
और सुस्ताने लगती हो जैसे ही
उस बरगद की शीतल छाँव में
यादों की चुन्नी फुदक फुदक कर
फिर फिर लिपट जाती होगी तुमसे।
हे मृदुले!
बोझिल पलके मुँद जाने के पहले
सिरहाने का वह रेशमी गिलाफ
फुसफुसाने लगता होगा कानों में तुम्हारे
वे अफसाने, तराने।
फिर तो....
वे कसीदे जो गढ़े गये थे
हमारी तुम्हारी बतकही के
टपकने लगते होंगे छौने बन कर
छत से टकरा टकरा कर
वे सपने अलोने-सलोने।
हे विशालाक्षी!
ठिठक-ठिठक जाते होंगे
आतुर आतुर तुम्हारे नयन अब भी
टूटे कवेलुओं और नुकीले पत्थर से
रास्ते के किनारे खड़ी चट्टानों पर
लिखे रह गये हमारे नामों पर
जिनको पढ़ते पढ़ते
गड़ जाता होगा उन पर
तुम्हारा लसलसा मन
हे सुचिते!
उड़ाती होंगी कौओं, सुग्गों और गौरेया को
उन मुंडेरो, मेहराबों, ख़िड़ाकियों पर से
बरबस ही पीट पीट कर तालियाँ
दिखलाया करती भी जिन्हें तुम
उन्हीं की तरह चिटिर पिटिर करते करते
हे शुभे!
चाहा होगा यदा कदा तुमने
सिकुड़ कर शून्य हो जाऊँ मैं
और खो दूँ मेरा अस्तित्व ही,
पर उन आलापों को रोक सकोगी कैसे तुम
जो अम्बर में जमे हुए स्मृति बिम्बों के
नेह मेह से पिघल पिघल कर
नन्ही नन्ही बूँदनियाँ बन
नहला रही होंगी तुम्हें अब भी।
श्रावणी फुहारों सी
जानता हूँ मैं यह और वह सब कि
जिसे भूलते भूलते थक गई हो तुम!
रामनारायण सोनी
३.३.२२
Sunday, 27 February 2022
तुम बिन
Monday, 21 February 2022
एक तू ही तू
ओ मेरे!
परम प्रिय परमात्मा!
देखा है आज मैंने
फिर से एक बार नई नजर से
कुछ अलग ही तरह से
सूर्य की आभा और प्रकाश को
पत्तों के रंग और सुन्दर आकार को
तड़ाग को और तैरती बतखों को
हिमालय और बर्फ में उबलते तप्तकुण्ड को
आकाश को और टँकी आकाशगंगाओं को
महसूस हुआ तू फूल में और खुशबू में
पवन में और प्राणों में
अलग-अलग, विविध-विभिन्न
संच्छिन्न और विच्छिन्न
कहाँ कहाँ और कहाँ नहीं
यत्र तत्र सर्वत्र
मेरे भीतर-बाहर भी
एक तू ही तू! बस तू ही तू!!
रामनारायण सोनी
२२.२.२२
Thursday, 17 February 2022
परमात्मा के अग्रदूत तुम
मैं कृतज्ञ हो लूँ
तुम्हारा सौंदर्य
जिन्दगी के थान का वह टुकड़ा
जब से मुझे मिले तुम
इसे बुना, रंगा और ओढ़ा है हमने
चादर बन कर टँगा है अब
यादों, वादों, इरादों की खूँटियों पर
कभी कभी देखता था इसे
तो कभी तुम्हें भी संग संग
वक्त गुजरता रहा
आईना तब तब का वर्तमान कहता रहा
कभी आनन्द मिला
तो कभी तकलीफें चुभती रही
न हाथ छूटे, न भरोसे ही खूटे
और हम भी कभी कहीं न टूटे
तन मेरा तुम्हारा तपता, गलता गया
जुड़ गए कुछ सिक्के,
और जुड़ते चले गये कुछ मिट्टी के ढेर
प्रिये!
वक्त की सरकती सुइयों संग
तन का सौन्दर्य पतझड़ सा क्षरता गया
मन का सौन्दर्य नवांकुरों सा निखरता गया
तुम्हारे अन्तस का
यह अखूट सौन्दर्य
जमा पूँजी है हमारी ज़िन्दगी की तिजोरी में
और....
देखो! हम कितने अमीर हो गये हैं
देख रहा हूँ मैं अपने अन्तर्चक्षुओं से
तुम्हारे हृदयतल पर खड़े
विशालकाय प्रेम पर्वत को
ऐ मेरे प्रिय!
तुम कितने सुन्दर हो
रामनारायण सोनी
१७.०२.२२
Tuesday, 15 February 2022
मेरी यह कविता
इसे क्या हो गया है यकायक
कि यह
रंगमंच के अनोखे दृश्य के पीछे
नेपथ्य की बुनावट देखने लगी है
श्रृव्य तरंगों के उस पार भी
कुछ कुछ सुनने लगी है
कागज के महीन कैनवास पर
लिपियों से चित्र बनाने लगी है
जाने कैसे
आइने के इस पार, उस पार के
आदमी को देखने, समझने लगी है
कडवे फूलों के पराग से
मधु का सृजन करने लगी है
आओ मेरे प्रिय आत्मन!
इसने तुम्हारी स्वप्न सारिका को
हौंसलों की उड़ान
देना खीख लिया है
नारियल के से कठोर
शब्दों के शल्क में
भावो का मृदुल जल
भरना जान लिया है
हृदय के आलिन्दों से
प्रेम करना सीख लिया है
मेरी यह कविता
सयानी होने लगी है।
रामनारायण सोनी
१६.०२.२२
गाओ दिल, अपने ही गीत
सुन!
ऐ मेरे दिल!!
एक लम्बी उम्र गुजार दी है तुमने
लोगों की बातें
और संगीत सुनने में
खोये भी रहे
उन महफ़िलों में, वादियों में, लयों में
वक्त पुकारता है अब तुम्हें
कि लिखो अपने गीत
गाओ और गुनगुनाओ अपने ही
गीत-संगीत
गीत इस जी हुई जिन्दगी के
संगीत अपने ही मचलते मिजाज का
रामनारायण सोनी
२१.१२. २०२२
काली कलूटी रात
Monday, 14 February 2022
बिन तुम्हारे क्या करूँगा
Sunday, 13 February 2022
जिन्दगी जिये जा रही है
जीत-हार
एक बूँद का महाकाव्य
धरा का श्रृंगार
मुझे तुम्हारा हृदय होना है
ए पुष्प!
तुम्हारे हृदयकोष को
बनाया है परमात्मा ने
जगत में परागण के
निस्तार और संचार के लिये
मुझे. . .
मुझे तुम्हारा हृदय होना है
रामनारायण सोनी
०५.०२.२०२२
रसो वै सः
मैं व्यर्थ ही में
अर्थ ढूँढता रहा
मौसम के मिजाज में
पवन के स्पर्श में
भूरे बादलों की नमी में
शाखों पर उभरती कोंपलों में
वेणु के स्वर रंध्रों में
परन्तु
मेरे प्रियतम!
तुम तो...
स्पंदित मिले
मेरे हृदय की वीथियों में
रमे हुये पोर पोर में
आच्छादित रस ग्रन्थियों में
प्रवाहित होते कण कण में
उच्छवास में, निःश्वास में
श्वास में, प्रश्वास में
कौंध जाते हो प्रिय
फिर तो...
विस्तार पा जाते हो तुम
अन्तस के आकाश से
बाहर के निस्सीम संसार तक
मौसम के निजाज में,
पवन के स्पर्श में,
बादलों की नमी में
नवाङ्कुरित कोपलों में
वेणु के अनुनाद में
व्यष्टि से समष्टि तक
तुम ही तुम, बस
रामनारायण सोनी
१३.०२.२२
Saturday, 5 February 2022
परागण
Friday, 4 February 2022
अपना आशियाना
तुम आये ऐसे!
पुकार के वे मेरे शब्द
बिखर गये अंतरिक्ष में
तुम्हें बिना छुए ही
तब मैंने
मन ही बिछा दिया था
तुम्हारे आगम पथ पर
बुझे बुझे नयन में
कितनी ज्योति जगी
भींगे भींगे बयन में
कैसी आस जगी
एकाकी मेरे जीवन में
तुम आये ऐसे कि फिर
कभी गए नहीं
रामनारायण सोनी
३.२.२०२२
Friday, 28 January 2022
बचपन की गलियाँ
उन पलों को जी रहे हो?
क्या कभी तुम उन पलों को
भूल से भी जी रहे हो।।
देखता हूँ जब जिधर भी, क्यूँ दिखाई दे रहे हो
गीत की हर पंक्ति में, फिर फिर सुनाई दे रहे हो।
क्या अभी भी रंग के, छ्पके हिये में ही पड़े है
जो पिरोये प्यार के पल , क्या अभी भी उर धरे हो।।
देखता हूँ जब जिधर भी, क्यूँ दिखाई दे रहे हो।
क्या कभी तुम उन पलों को, भूल से भी जी रहे हो।।
मन कभी तन से निकल कर, दौड़ता उन वीथियों में
खिड़कियों की सीखचों से, झाँकता है झिल्लियों में।
क्या वही पगण्डियाँ सब, आज भी वैसी खड़ी हैं?
फुसफुसाती बतकही वे, क्या हृदय में ना गड़ी है?
देखता हूँ जब जिधर भी, क्यूँ दिखाई दे रहे हो।
क्या कभी तुम उन पलों को, भूल से भी जी रहे हो।।
याद है उन झुरमुटों के, बीच उगता चाँद वह भी
शीश का आभार काँधे, हो रहा महसूस अब भी।
केश के विन्यास टूटे थे, महज इक अंगुली से
पंखुड़ी थी महमहाती, जो बिखरती अंजुली से।।
देखता हूँ जब जिधर भी, क्यूँ दिखाई दे रहे हो।
क्या कभी तुम उन पलों को, भूल से भी जी रहे हो।।
जब लगी मेंहदी महावर, रंग राची थी हथेली
गीत, डफली, ढोलकों से, सज्ज थी तेरी हवेली।
पार इसके क्या सुना था? गीत मन में गुनगुना था
उत्सवों की भीड़ में भी, एक बस मैं अनमना था।।
देखता हूँ जब जिधर भी, क्यूँ दिखाई दे रहे हो।
क्या कभी तुम उन पलों को, भूल से भी जी रहे हो।।
क्या कभी नेपथ्य के फिर, अनकहे संवाद गूँजे?
क्या कभी उन मंदिरों के, देव जा कर फिर न पूजे?
याद हैं वह पुष्प मुझको, देव प्रतिमा से गिरा था
बाँट कर दो भाग मे जो, छिप छिपा हमने धरा था।।
देखता हूँ जब जिधर भी, क्यूँ दिखाई दे रहे हो।
क्या कभी तुम उन पलों को, भूल से भी जी रहे हो।।
तुम न थी तो कौन था वो, सब तरफ मेरे खड़ा था
देह की गठरी खुली तो, कौन उस यम से लड़ा था।
क्या तुम्हारी बज़्म में, चर्चे मेरे भी हो सके हैं
दौड़ तुम तक अब न होगी, उम्र के ये पग थके हैं।।
देखता हूँ जब जिधर भी, क्यूँ दिखाई दे रहे हो।
क्या कभी तुम उन पलों को, भूल से भी जी रहे हो।।
क्यूँ न जाने लग रहा है, जिन्दगी दो फाड़ सी है
एक मेरे साथ अब है, दूसरी मन में धँसी है।
(चुटकियों में चुक गई वो)
तब पलों में चुक गई जो, अब दिवा के स्वप्न सी है
गाँठ में बस याद की वो, इक इमारत भग्न सी है।।
देखता हूँ जब जिधर भी, क्यूँ दिखाई दे रहे हो।
क्या कभी तुम उन पलों को, भूल से भी जी रहे हो।।
रामनारायण सोनी
28.01.22
उम्र कलम की कच्ची है
उम्र कलम की कच्ची है
नादानी इसकी सच्ची है
उम्र कलम की छोटी है यह
कुछ का कुछ कह जाती है
साफ नहीं बोली इसकी यह
कहते कहते तुतलाती है।
शाई केवल नीली ही थी
पर रंगों का संसार रचा है
जान नहीं बेजान भले है
भावों का अम्बार भरा है।।
उम्र कलम की कच्ची है।
नादानी इसकी सच्ची है।।
झुग्गी में मुनिया को रोते
देख सिसकने लगती है
हलकू की ठिठुरन देखे तो
खुद भी कँपने लगती है।
सहलाती पाँवों के छाले
मरहम हाथों से मलती है
लँगड़ाते शैशव को पकड़े
हौले हौले संग चलती है।।
उम्र कलम की कच्ची है।
नादानी इसकी सच्ची है।।
चूल्हे में न जली आग पर
पेट झुलसता है भूखों से
किलकारी मरते देखी जब
लल्ली की गुमसुम चीखों से।
यह मासूम कलम रोती है
उसके संग संग खोली में
मदद जुटाने दौड़ी जाती
माँग रही लटपट बोली में।।
उम्र कलम की कच्ची है।
नादानी इसकी सच्ची है।।
जब से सुना किसी कुटिया में
लाल बहादुर जन्मा था
और कहीं पर एक कलाम का
वह कमाल का कर्मा था।
डायर का वह महाकाल भी
कुटिया में ही पला बढ़ा था
विष्णु गुप्त ने भारत माँ के
ग्वाला माथे एक मढ़ा था।।
उम्र कलम की कच्ची है।
नादानी इसकी सच्ची है।।
तब से दर दर भटक भटक
गुदड़ी, कुटिया ढूँढ रही है
ऐसे लाल कहीं मिल जाए
उन सपनों में झूल रही है।
इक दिन उम्र पकेगी इसकी
फिर इक नया सवेरा होगा
भारत माँ के भाल सजाने
फिर से कोई चितेरा होगा।।
उम्र कलम की कच्ची है।
नादानी इसकी सच्ची है।।
इसमें बाबा की झिड़की है
और अम्मा का प्यार भरा
रामनारायण सोनी
१.१.२२
मेरी अपनी पीड़ाएँ
बड़ी गौर से
देखता हूँ, सुनता हूँ, समझता हूँ
मेरी अपनी ही पीड़ाओं को
वे संदेशवाहिनी है
अपने और अपनों के
दर्दों की, मर्मों की
अच्छी लगती है मुझे
मेरी अपनी ही पीड़ाएँ
रामनारायण सोनी
११.१२.२१
बात इत्ती सी
अनमने हैं घाट पनघट
मौन लहरें हैं बुझी सी अनमने हैं घाट पनघट
एक दिन फिर टूट कर बन गया इतिहास नटखट।
थक गई नावें सभी ये हैं खुले मस्तूल फिर भी
लौटती पनिहारियाँ भी निज घरों को आज झटपट।।
जोहता है बाट किसकी प्यास नजरों में लिये यह
देह-मन गीले लिये यह कौन साहिल पर खड़ा है।
वह न लौटेगी कभी भी जान कर अनजान हो कर
अनगिनत मनुहार ले कर साँस साधे क्यों खड़ा है।।
बन्दिनी सब कामनाएँ आस सब सूली चढ़ी हैं
अर्चियाँ डूबी तिमिर में कुन्द सी साँसे पड़ी है।
साँझ से पहले अँधेरों ने पसारे पंख कारे
सज सँवर काँधे चढ़ी वो प्रीत की डोली खड़ी है।।
लेख गुम्फित है नियति के लिख गए आधी कहानी
प्राण की संचेतना क्यों छीन कर अधबीच मानी।
क्यों बिछी चादर प्रणय की जब बिखरना तय किया था
क्यों हृदय में प्रीत डाली फिर लिखी टूटी कहानी।।
देखता ही रह गया वह उठ रहे नभ के रवों को
कौंधती उन बिजलियों को और स्वप्नों के शवों को।
बिन अवध साकेत कैसा, प्राण बिन नर देह कैसी
यह धरा कैसी लगेगी तोड़ कर देखो ध्रुवों को।।
क्रन्दनों के गाँव में हम द्वार की दहलीज पर ही
अनमने आधे अधूरे और सूखे ओंठ ले कर।
घुट रहे मन प्राण अपने जो गये तिल तिल बिखर
भाग्य के अभिलेख कैसे ढा गया कैसा कहर।।
रामनारायण सोनी
१९.१२.२१
Tuesday, 1 June 2021
दुबका बैठा जीवन है
इस पसरे सन्नाटे में यह जीवन दुबका बैठा है।
हिरनो जैसी दौड़ छाेड़ टूटी खटिया पर लेटा है।।
घर में हैं घरवाले फिर भी घर क्यों खाली लगता है।
शोर थमा बाहर का फिर नीरव क्यों गाली लगता है।।
वही हवा और पुष्प सभी वैसी ही सौरभ देते हैं।
फिर भी डरते डरते हम एक पाँव डगर पर धरते हैं।।
जाने कौन दिशा से आ वह चुपचाप पटखनी दे देगा।
हम डरे डरे सहमे घर में कब हमें फिरकनी कर देगा।।
तेरी गलती की सजा मुझे गर तू चुप ना बैठेगा।
तेरे पापों की गठरी को जबरन मेरे सिर रक्खेगा।।
इसीलिये डण्डा ले कर सड़कों पर शासन उतरा है।
संयम की अच्छी साध लिये मानव घर में पसरा है।।
तू छोड़ फिक्र इस दुर्दिन की अच्छे दिन जल्दी आवेंगे।
फिर से फुलबगिया महकेगी घर घर दिये जलायेंगे।।
फिर नई सुबह में नया जोश जीवन फिर से महकेगा।
मेरे इस आँगन में बबली बबुआ फिर से ठुमकेगा।।
रामनारायण सोनी
३०.०५.21