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Tuesday, 15 March 2022

हम तुम

विस्तारण मेरे हृदय का
देख नहीं पाये हो तुम
क्योंकि इसी में तो हो तुम
प्रस्रवन देखा ही नही तुमने 
मेरे अजस्र प्रेम का
क्योंकि घुलमिल गये हो इसीमें तुम
स्पन्दन मेरे हृदय का
शायद नही होगा महसूस तुम्हें
क्योंकि स्पन्दन हमारे तुम्हारे हृदय के भी
लयलीन हो कर ये गड्डमड्ड गये हैं
और इसलिये भी कि 
एकमेक हो गये हैं हम और तुम
 
रामनारायण सोनी
१५.०३.२२

Thursday, 3 March 2022

नेह की वही शपथ

चुभे शूल मेरे तलवों में
चीख तुम्हारी निकल गई थी
टीस हुई जब मेरे दिल में
साँस तुम्हारी विकल हुई थी
करुण हृदय की, कथा रुदन की तुम्हें सुनाने आया हूँ।
उसी नेह की वही शपथ फिर आज दिलाने आया हूँ।।

तोड़ गई सपने प्रभात में
ऊषा की स्वर्णिम किरणें ही
छोड़ गई रीती गागर सब
आशा पनिहारिन पनघट ही
इस एकाकी पथ पर उमड़े पतझार दिखाने आया हूँ।
उसी नेह की वही शपथ फिर आज दिलाने आया हूँ।।

यहीं कहीं अन्तस की गाँठें
खोल खोल रख डाली थी
नील नयन के नील गगन पर
पलकों की चादर डाली थी
टूटे बिखरे मन की किरचें, तुम्हें बताने आया हूँ।
उसी नेह की वही शपथ फिर आज दिलाने आया हूँ।।

आँगन आँगन बिरवा सूखे
पवन उकेरे कहीं जुन्हाई
चंचरीक की गुंजन लगती
होली के दिन बिरहा गाई
झुकी की नीम की टहनी पर, तुम्हें झुलाने आया हूँ।
उसी नेह की वही शपथ फिर आज दिलाने आया हूँ।।

रामनारायण सोनी 
३.३.२२









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जानता हूँ मैं

जानता हूँ मैं
भूलते भूलते थक गई हो तुम!
और सुस्ताने लगती हो जैसे ही
उस बरगद की शीतल छाँव में
यादों की चुन्नी फुदक फुदक कर
फिर फिर लिपट जाती होगी तुमसे।

हे मृदुले! 
बोझिल पलके मुँद जाने के पहले
सिरहाने का वह रेशमी गिलाफ
फुसफुसाने लगता होगा कानों में तुम्हारे
वे अफसाने, तराने।
फिर तो....
वे कसीदे जो गढ़े गये थे
हमारी तुम्हारी बतकही के
टपकने लगते होंगे छौने बन कर
छत से टकरा टकरा कर
वे सपने अलोने-सलोने।

हे विशालाक्षी!
ठिठक-ठिठक जाते होंगे
आतुर आतुर तुम्हारे नयन अब भी
टूटे कवेलुओं और नुकीले पत्थर से
रास्ते के किनारे खड़ी चट्टानों पर
लिखे रह गये हमारे नामों पर
जिनको पढ़ते पढ़ते
गड़ जाता होगा उन पर
तुम्हारा लसलसा मन

हे सुचिते!
उड़ाती होंगी कौओं, सुग्गों और गौरेया को
उन मुंडेरो, मेहराबों, ख़िड़ाकियों पर से
बरबस ही पीट पीट कर तालियाँ
दिखलाया करती भी जिन्हें तुम
उन्हीं की तरह चिटिर पिटिर करते करते

हे शुभे!
चाहा होगा यदा कदा तुमने
सिकुड़ कर शून्य हो जाऊँ मैं
और खो दूँ मेरा अस्तित्व ही,
पर उन आलापों को रोक सकोगी कैसे तुम
जो अम्बर में जमे हुए स्मृति बिम्बों के
नेह मेह से पिघल पिघल कर 
नन्ही नन्ही बूँदनियाँ बन
नहला रही होंगी तुम्हें अब भी।
श्रावणी फुहारों सी

जानता हूँ मैं यह और वह सब कि
जिसे भूलते भूलते थक गई हो तुम!

रामनारायण सोनी
३.३.२२

Sunday, 27 February 2022

तुम बिन

इसलिए तो कहता हूँ!!!
मेरी कृतियों में से अगर तुम निकल गए 
तो उन आड़े तिरछे निरर्थक
अक्षरों, शब्दों में बचेगा ही क्या?
देखना चाहते हो अगर स्वयं को तुम
तो मेरी रचनाओं में 
बस एक बार 
हाँ! एक बार घूम कर चले जाना!
कि क्या हो तुम 
मेरे लिये।
यहाँ! बस तुम ही तुम हो!!

रामनारायण सोनी
२६.०२.२२ 

Monday, 21 February 2022

एक तू ही तू

ओ मेरे!
परम प्रिय परमात्मा!
देखा है आज मैंने
फिर से एक बार नई नजर से
कुछ अलग ही तरह से
सूर्य की आभा और प्रकाश को
पत्तों के रंग और सुन्दर आकार को
तड़ाग को और तैरती बतखों को
हिमालय और बर्फ में उबलते तप्तकुण्ड को
आकाश को और टँकी आकाशगंगाओं को
महसूस हुआ तू फूल में और खुशबू में
पवन में और प्राणों में
अलग-अलग, विविध-विभिन्न
संच्छिन्न और विच्छिन्न
कहाँ कहाँ और कहाँ नहीं 
यत्र तत्र सर्वत्र
मेरे भीतर-बाहर भी
एक तू ही तू! बस तू ही तू!!

रामनारायण सोनी
२२.२.२२



Thursday, 17 February 2022

परमात्मा के अग्रदूत तुम

परमात्मा के अग्रदूत
 
सुन ए मानव!
मौजूद है तुझ में 
पवित्र संगम पार्थिव और चेतना का
नश्वर और अविनश्वर का
पर मौजूद भी है तुम में
एक अन्तर्जगत अन्तर्द्वन्द्वों का 
सत्य और अनृत का 
पीयूष और मृगजल की मरीचिकाओं का
नहीं भाग सकोगे कभी भी
अपने हत भाग्य, दुर्भाग्य से तुम!

जान सको तो जानो 
फिर भी, हाँ फिर भी
श्रेष्ठतम सृजन हो तुम इस धरा पर
जगत के रचयिता, नियन्ता का
तुमने ही खोजा और जाना है...
प्रकाश, पावक, पवन, पवि और पुरुषार्थ
समझा है क्रम से....
अस्तित्व प्रकृति का आत्मा-परमात्मा का
अग्रदूत हो तुम इस जगत में...
ईश्वर और पमात्म सत्ता के
तुम्हें ध्यान रहे, भान रहे
ए श्रेष्ठ मानव!

रामनारायण सोनी
१८.०२.२२

मैं कृतज्ञ हो लूँ

मैं कृतज्ञ हो लूँ

कौन है वह ?
जो मेरे जीवन में
आज फिर सूरज सरका गया
कौन है वह?
जो मेरी भूख को पहिचान कर
धरती में दाने उगा गया
देखा नहीं किसी को मैंने
जो झाड़ों की लकड़ी में आग भरता रहा
देख कर इस धरती की प्यास को
दौड़ दौड़ कर कौन यह
उलीच लाया है समुन्दरों को
आखिर है कौन यह ?
जो धड़क रहा है मुझ में अहर्निश,
जानता हूँ कि एक दिन
घट जाऊँगा पूरा का पूरा मैं ही और सभी
फिर भी जोड़ जाता है 
कुछ न कुछ रोज ही मुझ में, इन सब में
बिन माँगे, बिन पूछे, बिन बताए
दिखते कहीं भी नहीं 
हजारों हाथ पैर और इशारे इसके
गर उसकी हवा खींच ली होती उसने
एक पल के लिये भी 
तो बचता नहीं कोई भी
देखने के लिये कि बचा कौन है ?
उठाता, बिठाता, चलाता,
सुलाता, जगाता सब को, कौन है यह?
वक्त है कि जानूँ और महसूस करूँ 
कृतज्ञ हो लूँ मैं
उस जगदात्मा, सर्वात्मा, परमात्मा का

रामनारायण सोनी
१८.०२.२२

तुम्हारा सौंदर्य

जिन्दगी के थान का वह टुकड़ा 

जब से मुझे मिले तुम
इसे बुना, रंगा और ओढ़ा है हमने
चादर बन कर टँगा है अब
यादों, वादों, इरादों की खूँटियों पर
कभी कभी देखता था इसे
तो कभी तुम्हें भी संग संग
वक्त गुजरता रहा
आईना तब तब का वर्तमान कहता रहा
कभी आनन्द मिला
तो कभी तकलीफें चुभती रही
न हाथ छूटे, न भरोसे ही खूटे
और हम भी कभी कहीं न टूटे
तन मेरा तुम्हारा तपता, गलता गया
जुड़ गए कुछ सिक्के,
और जुड़ते चले गये कुछ मिट्टी के ढेर
प्रिये!
वक्त की सरकती सुइयों संग
तन का सौन्दर्य पतझड़ सा क्षरता गया
मन का सौन्दर्य नवांकुरों सा निखरता गया
तुम्हारे अन्तस का
यह अखूट सौन्दर्य
जमा पूँजी है हमारी ज़िन्दगी की तिजोरी में
और....
देखो! हम कितने अमीर हो गये हैं
देख रहा हूँ मैं अपने अन्तर्चक्षुओं से
तुम्हारे हृदयतल पर खड़े
विशालकाय प्रेम पर्वत को

ऐ मेरे प्रिय!
तुम कितने सुन्दर हो

रामनारायण सोनी
१७.०२.२२

Tuesday, 15 February 2022

मेरी यह कविता

इसे क्या हो गया है यकायक

कि यह
रंगमंच के अनोखे दृश्य के पीछे
नेपथ्य की बुनावट देखने लगी है
श्रृव्य तरंगों के उस पार भी
कुछ कुछ सुनने लगी है
कागज के महीन कैनवास पर
लिपियों से चित्र बनाने लगी है

जाने कैसे
आइने के इस पार, उस पार के
आदमी को देखने, समझने लगी है
कडवे फूलों के पराग से
मधु का सृजन करने लगी है
आओ मेरे प्रिय आत्मन!
इसने तुम्हारी स्वप्न सारिका को
हौंसलों की उड़ान
देना खीख लिया है
नारियल के से कठोर
शब्दों के शल्क में
भावो का मृदुल जल
भरना जान लिया है
हृदय के आलिन्दों से
प्रेम करना सीख लिया है
मेरी यह कविता
सयानी होने लगी है।

रामनारायण सोनी
१६.०२.२२

गाओ दिल, अपने ही गीत

सुन!

ऐ मेरे दिल!!
एक लम्बी उम्र गुजार दी है तुमने
लोगों की बातें
और संगीत सुनने में
खोये भी रहे
उन महफ़िलों में, वादियों में, लयों में
वक्त पुकारता है अब तुम्हें
कि लिखो अपने गीत
गाओ और गुनगुनाओ अपने ही
गीत-संगीत
गीत इस जी हुई जिन्दगी के
संगीत अपने ही मचलते मिजाज का

रामनारायण सोनी  
२१.१२. २०२२

काली कलूटी रात

तुम कहते हो 
ओ! काली कलूटी रात!!
काले अंधेरों से भरी हो तुम!
लेकिन यही है वह रात
जो दर रोज खोलती है
अपनी विशाल बाहें,
समा लेती है उसमें
सूरज और रोशनी उसकी
खोलती है नये द्वार और पटल
कि तुम देख सको
झिलामिलाते नक्षत्रों को,
या उन चकोरों का 
दूधिया आकाश, चाँद 
और उसकी चाँदनी भी
सो सको उसकी
विश्राम भरी गोद में
अपनी थकन और पीड़ा
वहीं कहीं, उसी में छोड़ आये हो तुम!
तुम्हें फिर लौटा देगी 
फिर तुम्हारा सूरज और वही रोशनी
यह काली कलूटी
तुम्हारी माँ ही की तरह

रामनारायण सोनी 
१५.०२.२२


Monday, 14 February 2022

बिन तुम्हारे क्या करूँगा

आज फिर संध्या खिली है
रोलियाँ घन में घुली है
पर रुदन का साज ले कर, पीर का आघात ले कर।
बिन तुम्हारे प्रीत का अभिसार ले कर क्या करूँगा।
नीर खुद प्यासा खड़ा फिर प्यास ले कर क्या करूँगा।।

बीज स्वप्नों के सलोने, 
हो रहे कितने अलोने 
मुट्ठियों से जो फिसलते, रेत में गिर कर पिघलते।
बिन तुम्हारे नेह का अधिभार ले कर क्या करूँगा।
नीर खुद प्यासा खड़ा फिर प्यास ले कर क्या करूँगा।।

लोचनों से अश्रु फूटे
आस के अनुबन्ध टूटे
इस हृदय के द्वार सिसके, अंगना के रंग फीके।
बिन तुम्हारे आगमन गल हार ले कर क्या करूँगा।
नीर खुद प्यासा खड़ा फिर प्यास ले कर क्या करूँगा।।

बाग महके शाख चहके
गुंजरित हो भ्रमर थिरके
सज रही सारी दिशाएँ, कह रही अपनी कथाएँ।
बिन तुम्हारे दर्श के श्रृंगार ले कर क्या करूँगा।
नीर खुद प्यासा खड़ा फिर प्यास ले कर क्या करूँगा।।

रामनारायण सोनी
१५.०२.२२

Sunday, 13 February 2022

जिन्दगी जिये जा रही है

कैसे कह दूँ
कि मेरे पास वक्त है
मुमकिन है, 
कि मैं ही वक्त की अमानत हूँ
कैसे मान लूँ..
कि मैं तुम्हारा हूँ?
भले ही तुम मेरे हो
कैसे समझ लूँ...
कि आकाश सिर्फ परिन्दों के लिये है?
जबकि मैं भी जिन्दा हूँ
उसी की प्राण वायु से

फिर भी न जाने क्यूँ 
मैं कहता हूँ, मानता हूँ, समझता हूँ
कि मैं समय की गोद में हूँ, 
तुम मेरे हो,
तभी तो..!
यह जिन्दगी यूँ ही
जिये चली जा रही है

रामनारायण सोनी 
१४.०२.२२



जीत-हार

मैं तब तब खुश होता हूँ
जब जब तुम मुझसे जीतते हो
या फिर, मैं तुमसे हारता हूँ
इस जीत हार के बगैर भी
मैं अनमना सा रहता हूँ
मैं सदा खुश रहना चाहता हूँ
चलो! फिर चहकें हम

रामनारायण सोनी 

एक बूँद का महाकाव्य

"ओस"
एक बूँद का वह महाकाव्य
रात के इस अन्तिम प्रहर में
आसमान से निचुड़ा आसव
प्रकृति के सुमधुर आँचल से
उतरा उस सहमे से पत्ते की 
सुकोमल गोद में
कुछ पलों की उम्र ले कर
जीता है हर उस पल को 
हो हो कर प्रफुल्लित, प्रमुदित 
मोती की सी चमक-दमक लेकर
देखता है चहुँ ओर निखिल विश्व को
लौटता है फिर से भोर में
अपने उसी उन्मुक्त आकाश में
कल फिर लौटने के लिये
इसी तरह..

रामनारायण सोनी
११.०१.२२

धरा का श्रृंगार


जब हृदय की भित्तियाँ रंगीन हों
जब शिराओं में प्रवाहित ओज हो
ताल लय से हो स्वरित सुर सर्जना
प्राण में रंजित रुचिर मधुमास हो
    रंग, रस और रूप का आलेप ले
    यह धरा श्रृंगार खुद का कर रही 

फूटती हो जव रुपहली रश्मियाँ
गा रही हो भैरवी सुरभित पवन
पीत पुष्पा अमलतासी वेणियाँ
स्वागतों में हो खड़े आतुर सुमन
    रंग, रस और रूप का आलेप ले
    यह धरा श्रृंगार खुद का कर रही 

 
Contd...

किंकिणी कर की खनकती

मन तरंगित 
 मिल स्वरों  जहाँ 

मुझे तुम्हारा हृदय होना है

ए पुष्प!
तुम्हारे हृदयकोष को
बनाया है परमात्मा ने
जगत में परागण के
निस्तार और संचार के लिये
मुझे. . .
मुझे तुम्हारा हृदय होना है

रामनारायण सोनी
०५.०२.२०२२ 

रसो वै सः

मैं व्यर्थ ही में

अर्थ ढूँढता रहा
मौसम के मिजाज में
पवन के स्पर्श में
भूरे बादलों की नमी में
शाखों पर उभरती कोंपलों में
वेणु के स्वर रंध्रों में

परन्तु
मेरे प्रियतम!
तुम तो...
स्पंदित मिले
मेरे हृदय की वीथियों में
रमे हुये पोर पोर में
आच्छादित रस ग्रन्थियों में
प्रवाहित होते कण कण में
उच्छवास में, निःश्वास में
श्वास में, प्रश्वास में
कौंध जाते हो प्रिय
फिर तो...
विस्तार पा जाते हो तुम
अन्तस के आकाश से
बाहर के निस्सीम संसार तक
मौसम के निजाज में,
पवन के स्पर्श में,
बादलों की नमी में
नवाङ्कुरित कोपलों में
वेणु के अनुनाद में
व्यष्टि से समष्टि तक
तुम ही तुम, बस

रामनारायण सोनी 
१३.०२.२२


Saturday, 5 February 2022

परागण

ए पुष्प!
तुम्हारे हृदयकोष को
बनाया है परमात्मा ने
जगत में परागण के 
निस्तार और संचार के लिये
मुझे तुम्हारा हृदय होना है

रामनारायण सोनी 
०५.०२.२०२२

Friday, 4 February 2022

अपना आशियाना

मैंने तैयार कर लिया है
खुद को 
अपने पुनर्सृजन के लिये,
मैं जानता हूँ
कई ध्वंस होंगे मुझ में
रूढ़ियाँ टूटेंगी कई!
नव कोंपलों के प्रस्फुटन में
पीड़ाएँ जन्मेंगी नई नई!!
फिर भी..
तोड़ कर उस अतीत के 
राज प्रासाद को
बनना है एक अदद
छोटा सा आशियाना
अदना सा, अपना सा
अपने लिये, अपनों के लिये
 
रामनारायण सोनी 
३.२.२०२२

तुम आये ऐसे!

पुकार के वे मेरे शब्द

बिखर गये अंतरिक्ष में
तुम्हें बिना छुए ही
तब मैंने
मन ही बिछा दिया था
तुम्हारे आगम पथ पर

बुझे बुझे नयन में
कितनी ज्योति जगी
भींगे भींगे बयन में
कैसी आस जगी
एकाकी मेरे जीवन में
तुम आये ऐसे कि फिर
कभी गए नहीं

    रामनारायण सोनी 
३.२.२०२२

Friday, 28 January 2022

बचपन की गलियाँ

बचपन की गलियाँ

एक दिन मैंने 
कहा खुद से खुदी को 
चल चलें यह चकाचौंध छोड़ 
उन बचपन की प्यारी गलियों में

वहाँ पड़ी हैं अभी भी
खुद अपने हाथ की बनी कुछ पतंगे, 
कुछ गिल्ली डंडे, 

टायर सोल की एन्टिक चप्पलें, 
साइकिल के पुराने उतरे टायर 
चल! डंडे से दौड़ाएंगे उन्हें

एक तिलिस्मी संदूक में- 
भरी पड़ी है यहाँ कुछ चीजें 
शक्कर के हमेल, कांगनियाँ
और लकड़ी के रंगीन लट्टू

टाट के बने हुए वे झोले 
जिनमें गिनती की तीन चार किताबें 
एक लकड़ी की फ्रेम में स्लेट
खड़िया की कलम, 
गोल्डन शाही की सूखी टिकिया, 
निब वाली होल्डर कलम,
बरु वाली कलम मेरी 

मिलेंगे कुछ सितोलिये के पत्थर 
एक चौखाने में रखे कांच के वे कंचे 
अभी वैसे के वैसे ही रंगीन हैं
और वे अनगढ़ पत्थरों के पाँचे

यादें कुछ कुछ धुंधली पड़ गई है मेरी 
पर ऐ जिंदगी! 
तेरी पीठ पर सब लदी हैं सब की सब
यहाँ एक चूड़ीदार बाजा भी हैं 
भरी है इसमें मस्त 
नाचते उछलते कूदते 
बच्चों की मस्त मस्त किलकारियाँ 
और सहगल के गाने

चल चलें इस दौड़ती दुनिया को छोड़ 
जिन्दगी की पहली दस माइलों में 
धूल धक्कड़ भरी फाइलों में
उन कच्चे घरों में पक्के रिश्ते हुआ करते थे
भोर में खपरैलों में से उठता धुआँ
पनघट पर घिर्रियों की वे चूँ चकड़ की आवाजें 
खजूर के पत्तों से बनी चटाई पर 
धूप सेंकते दादी मां के आसपास बैठे 
गली के प्यारे प्यारे वे बच्चे 

ऐ जिंदगी! बहुत कुछ और भी लिखा है 
फौलादी अक्षरों से तेरे दिल पर 
तो, आ! चल चलें लौटकर 
थोड़ा छ्पाक कर के कूद लें
कीचड़ भरे डोबरों में
सौंधियाती मेरी गाँव की माटी में

ऐ जिन्दगी! तू जरा ध्यान से सुन !
मैं ना सही 
तू ही खेल आया कर 
कभी कभी उन गोंईयों के साथ 
देख जरा! गांव के बाहर 
सती के ओटले पर 
बिखरे हुए अनाज के "चूगे" पड़े हैं अभी भी
खड़ा है अभी भी वह बूढ़ा बरगद 
सुबह शाम चहचाहट करते पंछी देखे हैं तूने!

घबरावे तू जब जब भी 
इस घुटन और आपाधापी भरे वातावरण से
घूम आया कर बिना पूछे बिना कहे
बचपन की गलियाँ

रामनारायण सोनी
२८.१२.१९

उन पलों को जी रहे हो?

क्या कभी तुम उन पलों को

भूल से भी जी रहे हो।।


देखता हूँ जब जिधर भी, क्यूँ दिखाई दे रहे हो 

गीत की हर पंक्ति में, फिर फिर सुनाई दे रहे हो।

क्या अभी भी रंग के, छ्पके हिये में ही पड़े है

जो पिरोये प्यार के पल , क्या अभी भी उर धरे हो।।

    देखता हूँ जब जिधर भी, क्यूँ दिखाई दे रहे हो।

    क्या कभी तुम उन पलों को, भूल से भी जी रहे हो।।


मन कभी तन से निकल कर, दौड़ता उन वीथियों में

खिड़कियों की सीखचों से, झाँकता है झिल्लियों में।

क्या वही पगण्डियाँ सब, आज भी वैसी खड़ी हैं?

फुसफुसाती बतकही वे, क्या हृदय में ना गड़ी है?

    देखता हूँ जब जिधर भी,  क्यूँ दिखाई दे रहे हो।

    क्या कभी तुम उन पलों को, भूल से भी जी रहे हो।।


याद है उन झुरमुटों के, बीच उगता चाँद वह भी

शीश का आभार काँधे, हो रहा महसूस अब भी।

केश के विन्यास टूटे थे, महज इक अंगुली से

पंखुड़ी थी महमहाती, जो बिखरती अंजुली से।।

    देखता हूँ जब जिधर भी, क्यूँ दिखाई दे रहे हो।

    क्या कभी तुम उन पलों को, भूल से भी जी रहे हो।।


जब लगी मेंहदी महावर, रंग राची थी हथेली

गीत, डफली, ढोलकों से, सज्ज थी तेरी हवेली।

पार इसके क्या सुना था? गीत मन में गुनगुना था

उत्सवों की भीड़ में भी, एक बस मैं अनमना था।।

    देखता हूँ जब जिधर भी, क्यूँ दिखाई दे रहे हो।

    क्या कभी तुम उन पलों को, भूल से भी जी रहे हो।।


क्या कभी नेपथ्य के फिर, अनकहे संवाद गूँजे?

क्या कभी उन मंदिरों के, देव जा कर फिर न पूजे?

याद हैं वह पुष्प मुझको, देव प्रतिमा से गिरा था

बाँट कर दो भाग मे जो, छिप छिपा हमने धरा था।।

    देखता हूँ जब जिधर भी, क्यूँ दिखाई दे रहे हो।

    क्या कभी तुम उन पलों को, भूल से भी जी रहे हो।।


तुम न थी तो कौन था वो, सब तरफ मेरे खड़ा था

देह की गठरी खुली तो, कौन उस यम से लड़ा था।

क्या तुम्हारी बज़्म में, चर्चे मेरे भी हो सके हैं

दौड़ तुम तक अब न होगी, उम्र के ये पग थके हैं।।

    देखता हूँ जब जिधर भी, क्यूँ दिखाई दे रहे हो।

    क्या कभी तुम उन पलों को, भूल से भी जी रहे हो।।


क्यूँ न जाने लग रहा है, जिन्दगी दो फाड़ सी है

एक मेरे साथ अब है, दूसरी मन में धँसी है।

(चुटकियों में चुक गई वो)

तब पलों में चुक गई जो, अब दिवा के स्वप्न सी है

गाँठ में बस याद की वो, इक इमारत भग्न सी है।।

    देखता हूँ जब जिधर भी, क्यूँ दिखाई दे रहे हो।

    क्या कभी तुम उन पलों को, भूल से भी जी रहे हो।।


रामनारायण सोनी

28.01.22





उम्र कलम की कच्ची है

उम्र कलम की कच्ची है
   नादानी इसकी सच्ची है

उम्र कलम की छोटी है यह
कुछ का कुछ कह जाती है
साफ नहीं बोली इसकी यह
कहते कहते तुतलाती है।
शाई केवल नीली ही थी
पर रंगों का संसार रचा है
जान नहीं बेजान भले है
भावों का अम्बार भरा है।।
   उम्र कलम की कच्ची है।
   नादानी इसकी सच्ची है।।

झुग्गी में मुनिया को रोते
देख सिसकने लगती है
हलकू की ठिठुरन देखे तो
खुद भी कँपने लगती है।
सहलाती पाँवों के छाले
मरहम हाथों से मलती है
लँगड़ाते शैशव को पकड़े
हौले हौले संग चलती है।।
   उम्र कलम की कच्ची है।
   नादानी इसकी सच्ची है।।

चूल्हे में न जली आग पर
पेट झुलसता है भूखों से
किलकारी मरते देखी जब
लल्ली की गुमसुम चीखों से।
यह मासूम कलम रोती है
उसके संग संग खोली में
मदद जुटाने दौड़ी जाती
माँग रही लटपट  बोली में।।
   उम्र कलम की कच्ची है।
   नादानी इसकी सच्ची है।।

जब से सुना किसी कुटिया में
लाल बहादुर जन्मा था
और कहीं पर एक कलाम का
वह कमाल का कर्मा था।
डायर का वह महाकाल भी
कुटिया में ही पला बढ़ा था
विष्णु गुप्त ने भारत माँ के
ग्वाला माथे एक मढ़ा था।।
    उम्र कलम की कच्ची है।
    नादानी इसकी सच्ची है।।

तब से दर दर भटक भटक
गुदड़ी, कुटिया ढूँढ रही है
ऐसे लाल कहीं मिल जाए
उन सपनों में झूल रही है।
इक दिन उम्र पकेगी इसकी
फिर इक नया सवेरा होगा
भारत माँ के भाल सजाने
फिर से कोई चितेरा होगा।।
    उम्र कलम की कच्ची है।
    नादानी इसकी सच्ची है।।

इसमें बाबा की झिड़की है
और अम्मा का प्यार भरा

रामनारायण सोनी
१.१.२२

मेरी अपनी पीड़ाएँ

बड़ी गौर से
देखता हूँ, सुनता हूँ, समझता हूँ
मेरी अपनी ही पीड़ाओं को
वे संदेशवाहिनी है
अपने और अपनों के
दर्दों की, मर्मों की
अच्छी लगती है मुझे
मेरी अपनी ही पीड़ाएँ

रामनारायण सोनी
११.१२.२१

बात इत्ती सी


यादें यादों के सागर में 
तैर जाती है 
कुछ इस तरह
बस थोड़ी सी तन्हाई चाहिये

दिल की इस नाव पर 
बाँधो मस्तूल
फेंक दो पतवार
बहने दो उन आवारा सी..
अल्हड़ तरंगो के संग
और फिर कोई लहर आये 
फिर उसके घाट पर
लंगर पड़ जाए
सब कुछ ठहर जाए
हाँ, वो भी और वक्त भी
बस..
बात इत्ती सी है

    रामनारायण सोनी

अनमने हैं घाट पनघट

मौन लहरें हैं बुझी सी अनमने हैं घाट पनघट

एक दिन फिर टूट कर बन गया इतिहास नटखट।
थक गई नावें सभी ये हैं खुले मस्तूल फिर भी
लौटती पनिहारियाँ भी निज घरों को आज झटपट।।

जोहता है बाट किसकी प्यास नजरों में लिये यह
देह-मन गीले लिये यह कौन साहिल पर खड़ा है।
वह न लौटेगी कभी भी जान कर अनजान हो कर
अनगिनत मनुहार ले कर साँस साधे क्यों खड़ा है।।

बन्दिनी सब कामनाएँ आस सब सूली चढ़ी हैं
अर्चियाँ डूबी तिमिर में कुन्द सी साँसे पड़ी है।
साँझ से पहले अँधेरों ने पसारे पंख कारे
सज सँवर काँधे चढ़ी वो प्रीत की डोली खड़ी है।।

लेख गुम्फित है नियति के लिख गए आधी कहानी
प्राण की संचेतना क्यों छीन कर अधबीच मानी।
क्यों बिछी चादर प्रणय की जब बिखरना तय किया था
क्यों हृदय में प्रीत डाली फिर लिखी टूटी कहानी।।

देखता ही रह गया वह उठ रहे नभ के रवों को
कौंधती उन बिजलियों को और स्वप्नों के शवों को।
बिन अवध साकेत कैसा, प्राण बिन नर देह कैसी
यह धरा कैसी लगेगी तोड़ कर देखो ध्रुवों को।।

क्रन्दनों के गाँव में हम द्वार की दहलीज पर ही
अनमने आधे अधूरे और सूखे ओंठ ले कर।
घुट रहे मन प्राण अपने जो गये तिल तिल बिखर
भाग्य के अभिलेख कैसे ढा गया कैसा कहर।।

रामनारायण सोनी
१९.१२.२१

Tuesday, 1 June 2021

दुबका बैठा जीवन है

इस पसरे सन्नाटे में यह जीवन दुबका बैठा है।
हिरनो जैसी दौड़ छाेड़ टूटी खटिया पर लेटा है।।
घर में हैं घरवाले फिर भी घर क्यों खाली  लगता है।
शोर थमा बाहर का फिर नीरव क्यों गाली लगता है।।

वही हवा और पुष्प सभी वैसी ही सौरभ देते हैं।
फिर भी डरते डरते हम एक पाँव डगर पर धरते हैं।।
जाने कौन दिशा से आ वह चुपचाप पटखनी दे देगा।
हम डरे डरे सहमे घर में कब हमें फिरकनी कर देगा।।

तेरी गलती की सजा मुझे गर तू चुप ना बैठेगा।
तेरे पापों की गठरी को जबरन मेरे सिर रक्खेगा।।
इसीलिये डण्डा ले कर सड़कों पर शासन उतरा है।
संयम की अच्छी साध लिये मानव घर में पसरा है।।

तू छोड़ फिक्र इस दुर्दिन की अच्छे दिन जल्दी आवेंगे।
फिर से फुलबगिया महकेगी घर घर दिये जलायेंगे।।
फिर नई सुबह में नया जोश जीवन फिर से महकेगा।
मेरे इस आँगन में बबली बबुआ फिर से ठुमकेगा।।

रामनारायण सोनी
३०.०५.21