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Tuesday, 12 December 2023

जय जय हे गुरुदेव

जय जय हे गुरुदेव!

तुम क्षितिज के पार से वो युक्ति कोई ढूँढ लाओ
केंचुली में मैं बँधा हूँ आ इसे तुम खोल जाओ
जो वचन तुमने दिया हाथ मस्तक पर छुआ था
मैं घिरा अवसाद में हूँ कर कृपा गुरूदेव आओ

अन्ध उर में घोर रजनी दण्ड ले कर आ खड़ी है
पाश है जकड़े हुए भवबन्ध की बाधा बड़ी है
व्यर्थनाओं से उमर भर ये झोलियाँ मैनें भरी है
पार तुम उतरावगे भवसिन्धु से, आशा बड़ी है

मैं तृणों की नोक सा हूँ तुम गहन आकाश से हो
मैं अकिंचन, मैं प्रवासी, मुक्ति के तुम द्वार से हो
तुम अभय के हो प्रदाता, सीस चरणों में नवाऊँ
तुम प्रथम, अन्तिम तुम्हीं दीन के विश्वास से हो।

रामनारायण सोनी
१३.१२.२३

Saturday, 16 September 2023

आओ तुम भी सुनो

आओ! तुम भी सुनो जरा!

दिशाएँ बोलती हैं
दरख्त, फ़िजाएँ, तितलियाँ
सब कैसे बोलती हैं 
उनकी अपनी जुबानी
वे ध्वनियाँ धन्य हैं
जो ले कर आती हैं
प्रतिध्वनियाँ फिर फिर दिलों तक

आवाजें दी थी मैंने कभी तुम्हें
जो दिशाओं में
गूँजती, अनुगूँजती हैं फिर फिर
वे न मरी हैं न मरेंगी कभी
आओ! तुम भी सुनो!
इसलिये कि...
इनमें तुम भी हो! मैं भी हूँ! साथ साथ!

रामनारायण सोनी

Tuesday, 18 July 2023

जो अभी तुम हो!

जो अभी तुम हो!

कोई होने दे रहा है तुम्हें
तो तुम हो!
जो अभी तुम हो!
सुबह वो ही, लाता है वो ही शाम भी
वह तुम में खास लाता है, आम भी
प्यास लाता है, और लाता है जाम भी
तुम कब के निकल लिये होते
वह उठाता है तुम्हें, सुलाता है शाम भी
कौन सी साँस आखरी हो जाए
खो सकते हो तन भी और यह नाम भी।
कोई होने दे रहा है
तो तुम हो।

ये मालो असबाब,
तरक्की और तुम्हारा ये काम भी
तुम्हारा ईमान और तुम्हारा हराम भी
सारे नाते और ये रिश्ते तमाम भी
मुठ्ठी मे रेत के मानिन्द गुलाम भी
एक खटके में खत्म हों जायें
इन सबके सभी काम भी।
कोई होने दे रहा है
तो तुम हो।

रामनारायण सोनी
१७.०७.२३

Saturday, 15 July 2023

मैं थोड़ा थोड़ा छूट गया हूँ

 मैं थोड़ा थोड़ा छूट गया हूँ


माँ बाबा की गोदी में मैं कुछ थोड़ा सा छूट गया हूँ

तुतलाती बोली ले उनके कानों में कुछ छूट गया हूँ
पलटा पीछे तो देखा वे कहीं दूर जो निकल गये हैं
खेल नियति के देख देख मैं बचपन में ही खूट गया हूँ
उन पल की पदचाप सुनी तो तिनका तिनका टूट गया हूँ

खड़िया की टूटी कलमों का मुँह में स्वाद अभी बाकी है
थूँक लगा कर लिखा मिटाकर पट्टी कैसे ढाँकी है
छड़ी गुरू की हाथ पड़ी थी अब भी मुझको याद बड़ी है
फिर भी सिर पर नेहिल उनकी छुअन अभी बाकी हैन्
पहले गुरू की पहली शिक्षा घूँट घूँट कर तभी पिया हूँ
उन पल की पदचाप सुनी तो तिनका तिनका टूट गया हूँ

अन्नी चन्नी, लंगड़ी में कुछ अंगबंग और चोक चंग में
सोलह सार मंडी फर्शी पर रोत्ता खेले यार संग में
होली के वे शक्कर गहने, पहने फिर कुट कुट खाये थे
कैसी शरम सरल बचपन में खेले खाये अजब ढंग में
उन सोने चाँदी के दिन में थोड़ा थोड़ा छूट गया हूँ 
उन पल की पदचाप सुनी तो तिनका तिनका टूट गया हूँ

रामनारायण सोनी
०७.०७.२३

कितना हो कर देखा मैंने

 कितना हो कर देखा मैंने


तुम्हारे बगैर कितना हो कर देखा है मैंने
मैंने हटात् देखा कि 
मैं शून्य की चट्टान से टकरा गया हूँ
कैसी फिसलन है ये
जो यादों के खण्डहर की
उस बावड़ी तक जाती है
जहाँ दलदल भर बची है अब।

तुम्हारे बगैर कितना हो कर देखा मैंने
चाँद तो रहा हूँ मैं, पर
भाग्य की कालिमा ने ढँक लिया मुझे
देखो! मैं अमावस का हो कर रह गया हूँ।

तुम्हारे बगैर कितना हो कर देखा मैंने
दीपक सा देखता हूँ औचक कर
निगल रही है दीपशिखा को
अपनी ही आशा की वर्तिका

तुम्हारे बगैर कितना हो कर देखा मैंने
हम दोनों की बीच की नेह सरिता की
धार सूख चली है
हमें नौकायन कराने वाली
कश्ती औंधे मुँह पड़ी है 
बिरहा की तपती रेत में

तुम्हारे बगैर कितना हो कर देखा मैंने
हथेली में बिधना की खींची रेखा
डोर थी जोड़ने वाली हमें-तुम्हें
उन हवाओं से बतियाती 
अठखेलियाँ करती पतंग की
मेरे हाथों में के हुचके से बिछुड़ गई है।

तुम्हारे बगैर कितना हो कर देखा मैंने
दौड़ता हूँ वृत्त की अन्तहीन
परिधि पर निरन्तर
न तो तुम मिले मेरे आवर्त में, 
तिस पर, खो गया हूँ मैं ही 

रामनारायण सोनी
३.०७.२३

परछाईं में जियूँगा

 परछाईं में जियूँगा


तुम्हारी स्निग्ध चाँदनी में 
मेरी परछाई और भी ठण्डी हो जाती है
मेरे मन तन में उठती अगन भी
इसे पिघला न सकेगी
जल भी जाए सब कुछ
सम्हाल कर रखना तुम
मेरी इस परछाई को
ताकि मैं इसमें जी सकूँ 
तुम्हारे लिये!

रामनारायण सोनी
०५.०७.२३

Saturday, 1 July 2023

मन गीत कोई गाने लगता है

नवगीत

मन गीत कोई गाने लागा है

विकल हृदय और तृषित अधर पर
जब से तेरी नवगुलाब की
पंखुड़ियों की छुअन मिली है।
मन की तपती हुई धरा को,
ओ शुष्क कंठ को
अमित नेह के रुचिर मेघ की
मीठी बूँद मिली है।।
   मुझमें इक पावस जागा है।
   मन गीत कोई गाने लागा है।।

शतदल से इस हृदय पत्र पर
बैठे हैं शबनम के मोती
अम्बर की चूनर में राका
तारक की मणिमाल पिरोती
प्रखर प्रेम में सनी वर्तिका
थाम खड़ी है जगमग ज्योति
ऐसे में पढ़ने को आतुर
तेरे इन नयनों की पाती
    यह प्रेम दीप ऐसे जागा है।
    मन गीत कोई गाने लागा है।।

जी चाहे फिर प्यास लगे,
फिर नयनों में आस जगे
फिर सीपी के फलक खुले वो
मोती का सा प्रेम पगे।
रीती गागर, सूने पनघट,
पनिहारिन के रसरी के संग
सर सर कर आती जाती
स्वाँस जगे प्रश्वाँस जगे।।
   अवगुण्ठन को जी भागा है।
    मन गीत कोई गाने लागा है।।

रामनारायण सोनी
०१.०७.२३

Tuesday, 27 June 2023

दो घूँट प्यार के ला देना


दो घूँट प्यार के ला देना

नहीं चाहिये सोम मुझे दो बूँद नेह की मिल जाए
नहीं मलय का चन्दन चाहूँ रिश्तों का लेपन मिल जाए।
मैं समझूँगा झोली में सब हीरे माणिक रत्न भरे है
नजर प्यार की पल भर को ही हौले से गर छू जाए।।
दो पल मुझे जिला देना, 
दो घूँट प्यार के ला देना।।

मेघदूत देखे बहुतेरे जो ले प्रेम पत्र उड़ते फिरते 
उपवन में चहके चंचरीक गुन गुन कर गुंजन हों करते।
मैं तो उन मीठे शब्दों की प्यास लिये बैठा हूँ
जो दिल के छालों पर मरहम सा लेपन हों करते।।  
दो पल मुझे जिला देना, 
दो घूँट प्यार के ला देना।। 

नहीं चाहिये इन्द्रधनुष के वे चटकीले से सात रंग
अमलतास की पीली लटकन झालर सा वह ढंग।
मेरी चाहत मसि पाने की जिससे लिख डालूँ 
जीवन में अपनों संग जीने वाली अलमस्त तुरंग।। 
दो पल मुझे जिला देना, 
दो घूँट प्यार के ला देना।। 

रामनारायण सोनी
२८.०६.२३

Monday, 26 June 2023

गीत सृजन के गावेंगे

बिना छेद की बंसी ने गीत कोई क्या गाया है?
बिना पीर के माता ने पूत कोई क्या जाया है?

तुम चलो उजालों की धरती पर छाया साथ रहेगी
मिले भले पूनम की रातें मावस भी तो तुम्हें मिलेगी
सुख की बिजली यदा कदा अँधियारे में दमकेगी
दुःख की काली घनी बदरिया मौजूद सदा रहेगी
बिना छेद की बंसी ने गीत कोई क्या गाया है?
बिना पीर के माता ने पूत कोई क्या जाया है?

बैठ शिखर पर ध्वजा बिचारी सदा पवन से लड़ती है
मेंहदी सिल पर घिस-घिस कर ही हाथों में रचती है।
ऊँचे वृक्षों महलों पर ही बिजली अक्सर गिरती है
कितना तपा हिमालय पूछो हमको तब गंगा मिलती है।।
बिना छेद की बंसी ने गीत कोई क्या गाया है?
बिना पीर के माता ने पूत कोई क्या जाया है?

कितने सहे प्रहार करारे पत्थर ने मूरत बनने तक
टूटे कितने पत्थर कण-कण धारा से प्रपात होने तक।
मिट्टी ने गल-तप कर ही तो रम्य इमारत बनती है
बीज मिटा है गल कर सड़ कर पादप के आने तक।।
बिना छेद की बंसी ने गीत कोई क्या गाया है?
बिना पीर के माता ने पूत कोई क्या जाया है?

हम जीवन की अक्षय निधि को पा कर भी बिसरे हैं
छोटी छोटी मुश्किल से भी धूल कणों के से बिखरे हैं।
जितने भी अवतार हुए वे अन्तःपीड़ा से गुजरे हैं
पर साहस और धर्म पर चल और अधिक निखरे हैं।।
बिना छेद की बंसी ने गीत कोई क्या गाया है?
बिना पीर के माता ने पूत कोई क्या जाया है?

जंगल हैं तो कभी कभी वे दावानल भी आवेंगे
कश्ती को भी सागर में वे निर्मम तूफान सतावंगे
काँटे कितने शाख उगेंगे फिर भी फूल खिलावेंगे
हार जीत का ख्याल भूल हम गीत सृजन के गावेंगे
बिना छेद की बंसी ने गीत कोई क्या गाया है?
बिना पीर के माता ने पूत कोई क्या जाया है?
बिना छेद की बंसी ने गीत कोई क्या गाया है?
बिना पीर के माता ने पूत कोई क्या जाया है?

रामनारायण सोनी
२७ .०६.२३

Thursday, 22 June 2023

दो दिये दो जिन्दगी

दो दिये दो जिन्दगी

दीप मैं और दीप तुम भी फिर विषमता क्यों हुई है।
दो ध्रुवों सी जिन्दगी ये किस तरह हम ने छुई है।।

जब गढ़ा था तन हमारा, एक से थे तेल-बाती
एक सी ही ज्योति वह है जो हमें आकर जलाती।।
नाम भी तो एक ही है पर मुझे आला मिला है
पर तुझी से अप्सराएँ थालियाँ अपनी सजाती।।
दीप मैं और दीप तुम भी फिर विषमता क्यों हुई है।
दो ध्रुवों सी जिन्दगी ये किस तरह हम ने छुई है।।

तुम सजे फानूस में यह भाग्य है प्रियतम तुम्हारा
इन कुटीरों के तमस से लड़ रहा हूँ मैं बिचारा
सोच लो पर इक घड़ी ही जल रहे हैं एक से हम
गर्व को तुमने प्रकासा जिन्दगी का हूँ मैं सहारा
दीप मैं और दीप तुम भी फिर विषमता क्यों हुई है।
दो ध्रुवों सी जिन्दगी ये किस तरह हम ने छुई है।।

तुम छतों पर कैद हो कर रोशनी की हो गवाही
देखते तुम प्यालियों को भर रही कैसे सुराही
देखता मैं जिन्दगी यह लिख रही कैसी सचाई
क्रन्दनों के गाँव में जो लिख रहा बचपन रुबाई
दीप मैं और दीप तुम भी फिर विषमता क्यों हुई है।
दो ध्रुवों सी जिन्दगी ये किस तरह हम ने छुई है।।

टट्टरों से झाँकती है घूरती प्यासी निगाहें
मोल में बिकती जवानी ओट में लेकर कराहें
ये वही तो लोग हैं जो तेरी बस्ती से हैं आये
कान उनके ना सुनेंगे चीख और इनकी कराहें
दीप मैं और दीप तुम भी फिर विषमता क्यों हुई है।
दो ध्रुवों सी जिन्दगी ये किस तरह हम ने छुई है।।

जिन्दगी जब लौटती है मुट्ठियों में प्राण ले कर
भार तन का झेलती अवसाद का अहसास ले कर
गिट्टियों के संग टूटे हाड़ और फिर भाग इनके
कट रहा कैसा सफर हर ओर है बहपा कहर
दीप मैं और दीप तुम भी फिर विषमता क्यों हुई है।
दो ध्रुवों सी जिन्दगी ये किस तरह हम ने छुई है।।

रामनारायण सोनी
22.06.23

Sunday, 18 June 2023

स्मृतियों में सदा जियूँगा




स्मृतियों में सदा जियूँगा

मृत्यु भले ही वरण करे मैं स्मृतियों में सदा जियूँगा
तुझे जिया हूँ जीते जी मैं छोड़ सुधा क्या गरल पियूँगा
मुझ में कितना दर्द घुला है
काँटों ने भी मुझे छला है
तप तप कर कितना पिघला मैं
तब साँचे में तेरे ढला मैं
तुझे भरम है भूल जायगा, फिर फिर तुझमें मैं लौटूँगा
मृत्यु भले ही वरण करे मैं स्मृतियों में सदा जियूँगा

क्या वे माटी के लमहे थे
जो पानी से बह निकले थे
क्या वे वचन निरे फिकरे थे
सौ सौ जो सौगंध भरे थे
उन्ही पलों की याद दिलाने, फिर फिर तुझमें मैं लौटूँगा
मृत्यु भले ही वरण करे मैं स्मृतियों में सदा जियूँगा

वट की लटकी हुई जड़ों की
पींगें क्या तुम बिसर गई हो
बेंदी चौड़े भाल सजा कर
नव कलिका सी निखर गई हो
उन बिम्बों की सुधी कराने, फिर फिर तुझ में लौटूँगा
मृत्यु भले ही वरण करे मैं स्मृतियों में सदा जियूँगा

चुपके चुपके उन तारों की
झिलमिल फिर फिर वही कहेगी
भाव भरे शब्दों की दिल में
रसधारा फिर वही बहेगी
उन शब्दों भावों में घुल कर, फिर फिर तुझ में लौटूँगा
मृत्यु भले ही वरण करे मैं स्मृतियों में सदा जियूँगा

श्यामल कुन्तल की वेणी में
बूँदनियों की माल सजी थी
माटी पहली बारिश पी कर
जब तन मन में सौंधी महकी थी
याद उसी की तुझे दिलाने, फिर फिर तुझ में लौटूँगा
मृत्यु भले ही वरण करे मैं स्मृतियों में सदा जियूँगा

रामनारायण सोनी

Friday, 16 June 2023

घुल जाएँ हम

घुल जाएँ हम

कहीं ऐसा न हो कि
सामने हो कर भी
पुतलियों में ही खड़ा रह जाऊँ
चलो हम मूँद लें
आँखें अपनी अपनी
जब तलक घुल न जाएँ हम
भीतर ही भीतर 
मैं तुझ में! तू मुझ में!!

रामनारायण सोनी
१६.०६.२३

Thursday, 15 June 2023

ऐ जिन्दगी

ऐ जिन्दगी

जिन्दगी मोड़ दे कर मुझे 
  खुद तो वहीं खड़ी है
कई ख्वाहिशें गलियारों में 
  अब भी वहीं पड़ी हैं

ऐ जिन्दगी खुद याद कर
   तू कब गले मिली थी
बस मैं ही चला अकेला
   तू साथ कब चली थी

खुश्क है तेरी हवाएँ
    पी गई पानी नयन का
सूख कर काँटा हुआ हर
    फूल मेरे इस चमन का

गुजरते हुए पलों की
     रफ्तार कम तो कर ले
ले लूँ जरा सा दम मैं
     तू भी जरा तो दम ले

लौटेंगे फिर कभी ना
      जो जो भी मेरे संग है
फिर से न मिल सकेगा
      यही मौज की लहर है

फिर कब जुड़ेंगे मेले
       अपनों का साथ इतना
टूटे न ख्वाब कोई
       अब टूटे न कोई सपना

छोटी सी मेरी अँजुरी
       थोडी बिसात इसकी
है डोर मेरी उलझी 
      थगती हुई पतंग की

इक दौर वो था जिसमें
      रोशन चराग थे सब
इक दौर ये है जिसमें
      श्याही में डूबी है शब
        
रामनारायण सोनी
१४.०६.२३


Sunday, 11 June 2023

चुभते हुए ख्वाब

चुभते हुए ख्वाब 

कुछ ख्वाब! चुभते बहुत हैं
तैर जाती है 
गुलमोहर के फूलों की रक्तिमा
आँखों के इन सकोरों में!
और फिर भर जाती है अचानक ही
सांभर झील की सी नमक-गन्ध 
ये कँटीले ख्वाब! 
चुभते बहुत हैं

रामनारायण सोनी
१२.०६.२३

Saturday, 10 June 2023

कस्तूरी के मृग

कस्तूरी के मृग ही क्यूँ  यूँ जंगल जंगल भाग रहे हैं।
पावन प्रेम पला जिन उर में वे सारी रातें जाग रहे हैं।।
अँधियारों से लड़ने वाले आले के सब दीप बुझे वे।
प्रात किरण से रो रो कर फिर से जीवन माँग रहे है।।

अधरों की पहचान बनी यह प्यास और डर का कंपन।
बहते नयनों को कोरों में ठहरेगा कैसे कोई अंजन।।
फूलों पर उस मृत तितली के अब तो केवल पंख बचे हैं।
प्रेम ग्रंथ में विरह व्यथा के किसने ये सोपान रचे हैं।।

हलकी सी चलती बयार से कॅंप जाती है शिखर पताका।
शबनम के आँसू पातों पर छोड़ गई वो ठिठुरी राका।।
पनघट, अमराई, चौपालों पर नहीं किसी ने ताका।
सुबक रहा बिरवा का आँगन बरसों से ना कोई झाँका।।

सूना नगर, हवेली सूनी कभी यहाँ वे रंगमहल थे।
सखियों की थी चुहलबाजियाँ चंचल चपल शगल थे।।
आगत के आगम में जिनके पलक पाँवड़े बिछ जाते थे।
उनमें से कुछ सुखद सलोने मीठे सपने बो जाते थे

जुड़ते नहीं रंग के मेले, आभासी दुनिया सारी है 
रिश्तों के सम्बोधन तक में पश्चिम हम पर भारी है
पलकों पर ठहरे काजल में कैसा आ कर खार घुला है
सच के माथे पड़ी शिलाएँ झूँठ अनर्गल भारी है

रामनारायण सोनी
११.०६.२३

Friday, 9 June 2023

तुम न आए

दुआ करो कि अब मेरी
       याददाश्त ही खो जाए।
दिल के दरिया में बहते पल 
       लौट कहीं न फिर आ जाएँ।।

बीते तन और रीते मन में
        फिर से ज्वार नहीं आ जाए।
अवगुंठन के शहदी सपने
        नयन कोर में धुल न जाए।।

सांझ सकारे अपने द्वारे
        देहरी का दीपक कहता है।
सब जग लौटा ठौर ठौर पर
        बाट निहारूँ, तुम ना आए।।

जो कहानी जी रही मैं
        मर चुकी कब की उसी में।
मौत ने लिख दी इबारत
        मैं जली फिर फिर उसी में।।

रामनारायण सोनी
6.6.23

मन का संस्पर्श

मन का संस्पर्श

जब भी मैंने तुम्हें देखा 
केवल तन के पार ही देखा है
रूह की निगाह से!
रूह को देखा है!!
अक्षर और शब्द छुप जाते हैं कहीं
अर्थ छोड़ जाते हैं, मेरे मन में
मन के आकाश में कहता है मन ही 
मन सुनता है मन ही मन
मन के संस्पर्श कितने गहरे हैं
भाव कोष में अभी भी गुदगुदाते हैं 
वैसे के वैसे ही

रामनारायण सोनी
८.६.२३


Wednesday, 7 June 2023

नदी के बेचारे पत्थर

नदी के बिचारे पत्थर

नदी की तलहटी में 
पत्थर कुछ पड़े हैं 
तो कुछ गड़े हैं 
अभी अभी कुछ लोग आए 
और छाती पर पांव रखकर चले गए 
जंगलात की मिट्टी आई 
वह कर चली गई मुझ पर से गुजर कर
धार नदी की कब से 
उजाल रही है हमें
काले ही हैं अब कुछ और काले हो गए 
कुछ चट्टानें बिवाइयों की तरह 
अभी भी फटी पड़ी है 
ये गड़े-पड़े चिकने पत्थर हैं
कुछ वर्ष पहले तक जल मग्न रहते थे 
धारे नदी के सब पी लिए हैं आदमी ने 
जल रहा हूँ मैं और मेरी नदी का तन-बदन 
अब आग उगलते हुए 
इस सूरज की तपिश में 
अब एक और नया डर समा गया है मुझमें
कि कोई आदमी आवेगा कहीं से
मुझे उखाड़ कर ले जावेगा 
मशीनों में भरकर पीस देगा हमें
गिट्टी और चूरी के रूप में टूट जावेंगे
चुन दिये जावेंगे हम सभी
एक दिन आदमी की 
ऐश-ओ-आराम देने वाली दीवारों में

रामनारायण सोनी
१.६.२३


Monday, 5 June 2023

रंगकर्म का सूत्रधार

रंगकर्म का सूत्रधार

कैसे सूत्रधार हो तुम
बिना मुखौटे के भी
चेहरा बदल दिया है मेरा तुमने!
मेरी ही आवाज में मुझमें से अब
बोलता है कोई और ही
तुम्हारे रंगकर्म में अब
धरातल पर कर्म के रंग नहीं बचे हैं
सब कुछ आभासी हो चुका है
सिनेमा घर के निर्जीव पर्दों पर 
चलती हुई परछाइयों की तरह
मेरी पुतलियों में तो बस
कठपुतलियाँ ही नृत्य करती हैं
नेपथ्य में बजती हुई थाप पर
मैं उछलता हूँ, कूदता हूँ, रोता-हँसता हूँ
उन सामने की कुर्सियों पर
लोग अँधेरे में ही डूबे डूबे
बड़े अजीब हैं ये लोग
मेरे साथ साथ बहने लगते हैं
वे खुद को 
मुझ में ही जीने लगते हैं
वे शायद जानते नहीं कि
मैं खुद ही ढँका हुआ होता हूँ पूरा का पूरा
चोलों, लबादों और मुखौटों से 
कभी कभी ये लोग
मेरे रोने पर खुशियाँ मनाते हैं
जैसे बच्चा जन्मते ही रोता है, तब
मेरे हँसने पर गुस्साते है, तब
जैसे खलनायक ने ठहाका लगाया हो
तंग आ चुका हूँ दूसरे-दूसरों को जीते जीते
हे मेरे जीवन के सूत्रधार!
अब.....
मैं मुझमें लौटना चाहता हूँ! 

रामनारायण सोनी
०६.०६.२३