Friday, 28 January 2022
बचपन की गलियाँ
उन पलों को जी रहे हो?
क्या कभी तुम उन पलों को
भूल से भी जी रहे हो।।
देखता हूँ जब जिधर भी, क्यूँ दिखाई दे रहे हो
गीत की हर पंक्ति में, फिर फिर सुनाई दे रहे हो।
क्या अभी भी रंग के, छ्पके हिये में ही पड़े है
जो पिरोये प्यार के पल , क्या अभी भी उर धरे हो।।
देखता हूँ जब जिधर भी, क्यूँ दिखाई दे रहे हो।
क्या कभी तुम उन पलों को, भूल से भी जी रहे हो।।
मन कभी तन से निकल कर, दौड़ता उन वीथियों में
खिड़कियों की सीखचों से, झाँकता है झिल्लियों में।
क्या वही पगण्डियाँ सब, आज भी वैसी खड़ी हैं?
फुसफुसाती बतकही वे, क्या हृदय में ना गड़ी है?
देखता हूँ जब जिधर भी, क्यूँ दिखाई दे रहे हो।
क्या कभी तुम उन पलों को, भूल से भी जी रहे हो।।
याद है उन झुरमुटों के, बीच उगता चाँद वह भी
शीश का आभार काँधे, हो रहा महसूस अब भी।
केश के विन्यास टूटे थे, महज इक अंगुली से
पंखुड़ी थी महमहाती, जो बिखरती अंजुली से।।
देखता हूँ जब जिधर भी, क्यूँ दिखाई दे रहे हो।
क्या कभी तुम उन पलों को, भूल से भी जी रहे हो।।
जब लगी मेंहदी महावर, रंग राची थी हथेली
गीत, डफली, ढोलकों से, सज्ज थी तेरी हवेली।
पार इसके क्या सुना था? गीत मन में गुनगुना था
उत्सवों की भीड़ में भी, एक बस मैं अनमना था।।
देखता हूँ जब जिधर भी, क्यूँ दिखाई दे रहे हो।
क्या कभी तुम उन पलों को, भूल से भी जी रहे हो।।
क्या कभी नेपथ्य के फिर, अनकहे संवाद गूँजे?
क्या कभी उन मंदिरों के, देव जा कर फिर न पूजे?
याद हैं वह पुष्प मुझको, देव प्रतिमा से गिरा था
बाँट कर दो भाग मे जो, छिप छिपा हमने धरा था।।
देखता हूँ जब जिधर भी, क्यूँ दिखाई दे रहे हो।
क्या कभी तुम उन पलों को, भूल से भी जी रहे हो।।
तुम न थी तो कौन था वो, सब तरफ मेरे खड़ा था
देह की गठरी खुली तो, कौन उस यम से लड़ा था।
क्या तुम्हारी बज़्म में, चर्चे मेरे भी हो सके हैं
दौड़ तुम तक अब न होगी, उम्र के ये पग थके हैं।।
देखता हूँ जब जिधर भी, क्यूँ दिखाई दे रहे हो।
क्या कभी तुम उन पलों को, भूल से भी जी रहे हो।।
क्यूँ न जाने लग रहा है, जिन्दगी दो फाड़ सी है
एक मेरे साथ अब है, दूसरी मन में धँसी है।
(चुटकियों में चुक गई वो)
तब पलों में चुक गई जो, अब दिवा के स्वप्न सी है
गाँठ में बस याद की वो, इक इमारत भग्न सी है।।
देखता हूँ जब जिधर भी, क्यूँ दिखाई दे रहे हो।
क्या कभी तुम उन पलों को, भूल से भी जी रहे हो।।
रामनारायण सोनी
28.01.22
उम्र कलम की कच्ची है
उम्र कलम की कच्ची है
नादानी इसकी सच्ची है
उम्र कलम की छोटी है यह
कुछ का कुछ कह जाती है
साफ नहीं बोली इसकी यह
कहते कहते तुतलाती है।
शाई केवल नीली ही थी
पर रंगों का संसार रचा है
जान नहीं बेजान भले है
भावों का अम्बार भरा है।।
उम्र कलम की कच्ची है।
नादानी इसकी सच्ची है।।
झुग्गी में मुनिया को रोते
देख सिसकने लगती है
हलकू की ठिठुरन देखे तो
खुद भी कँपने लगती है।
सहलाती पाँवों के छाले
मरहम हाथों से मलती है
लँगड़ाते शैशव को पकड़े
हौले हौले संग चलती है।।
उम्र कलम की कच्ची है।
नादानी इसकी सच्ची है।।
चूल्हे में न जली आग पर
पेट झुलसता है भूखों से
किलकारी मरते देखी जब
लल्ली की गुमसुम चीखों से।
यह मासूम कलम रोती है
उसके संग संग खोली में
मदद जुटाने दौड़ी जाती
माँग रही लटपट बोली में।।
उम्र कलम की कच्ची है।
नादानी इसकी सच्ची है।।
जब से सुना किसी कुटिया में
लाल बहादुर जन्मा था
और कहीं पर एक कलाम का
वह कमाल का कर्मा था।
डायर का वह महाकाल भी
कुटिया में ही पला बढ़ा था
विष्णु गुप्त ने भारत माँ के
ग्वाला माथे एक मढ़ा था।।
उम्र कलम की कच्ची है।
नादानी इसकी सच्ची है।।
तब से दर दर भटक भटक
गुदड़ी, कुटिया ढूँढ रही है
ऐसे लाल कहीं मिल जाए
उन सपनों में झूल रही है।
इक दिन उम्र पकेगी इसकी
फिर इक नया सवेरा होगा
भारत माँ के भाल सजाने
फिर से कोई चितेरा होगा।।
उम्र कलम की कच्ची है।
नादानी इसकी सच्ची है।।
इसमें बाबा की झिड़की है
और अम्मा का प्यार भरा
रामनारायण सोनी
१.१.२२
मेरी अपनी पीड़ाएँ
बड़ी गौर से
देखता हूँ, सुनता हूँ, समझता हूँ
मेरी अपनी ही पीड़ाओं को
वे संदेशवाहिनी है
अपने और अपनों के
दर्दों की, मर्मों की
अच्छी लगती है मुझे
मेरी अपनी ही पीड़ाएँ
रामनारायण सोनी
११.१२.२१
बात इत्ती सी
अनमने हैं घाट पनघट
मौन लहरें हैं बुझी सी अनमने हैं घाट पनघट
एक दिन फिर टूट कर बन गया इतिहास नटखट।
थक गई नावें सभी ये हैं खुले मस्तूल फिर भी
लौटती पनिहारियाँ भी निज घरों को आज झटपट।।
जोहता है बाट किसकी प्यास नजरों में लिये यह
देह-मन गीले लिये यह कौन साहिल पर खड़ा है।
वह न लौटेगी कभी भी जान कर अनजान हो कर
अनगिनत मनुहार ले कर साँस साधे क्यों खड़ा है।।
बन्दिनी सब कामनाएँ आस सब सूली चढ़ी हैं
अर्चियाँ डूबी तिमिर में कुन्द सी साँसे पड़ी है।
साँझ से पहले अँधेरों ने पसारे पंख कारे
सज सँवर काँधे चढ़ी वो प्रीत की डोली खड़ी है।।
लेख गुम्फित है नियति के लिख गए आधी कहानी
प्राण की संचेतना क्यों छीन कर अधबीच मानी।
क्यों बिछी चादर प्रणय की जब बिखरना तय किया था
क्यों हृदय में प्रीत डाली फिर लिखी टूटी कहानी।।
देखता ही रह गया वह उठ रहे नभ के रवों को
कौंधती उन बिजलियों को और स्वप्नों के शवों को।
बिन अवध साकेत कैसा, प्राण बिन नर देह कैसी
यह धरा कैसी लगेगी तोड़ कर देखो ध्रुवों को।।
क्रन्दनों के गाँव में हम द्वार की दहलीज पर ही
अनमने आधे अधूरे और सूखे ओंठ ले कर।
घुट रहे मन प्राण अपने जो गये तिल तिल बिखर
भाग्य के अभिलेख कैसे ढा गया कैसा कहर।।
रामनारायण सोनी
१९.१२.२१
Tuesday, 1 June 2021
दुबका बैठा जीवन है
इस पसरे सन्नाटे में यह जीवन दुबका बैठा है।
हिरनो जैसी दौड़ छाेड़ टूटी खटिया पर लेटा है।।
घर में हैं घरवाले फिर भी घर क्यों खाली लगता है।
शोर थमा बाहर का फिर नीरव क्यों गाली लगता है।।
वही हवा और पुष्प सभी वैसी ही सौरभ देते हैं।
फिर भी डरते डरते हम एक पाँव डगर पर धरते हैं।।
जाने कौन दिशा से आ वह चुपचाप पटखनी दे देगा।
हम डरे डरे सहमे घर में कब हमें फिरकनी कर देगा।।
तेरी गलती की सजा मुझे गर तू चुप ना बैठेगा।
तेरे पापों की गठरी को जबरन मेरे सिर रक्खेगा।।
इसीलिये डण्डा ले कर सड़कों पर शासन उतरा है।
संयम की अच्छी साध लिये मानव घर में पसरा है।।
तू छोड़ फिक्र इस दुर्दिन की अच्छे दिन जल्दी आवेंगे।
फिर से फुलबगिया महकेगी घर घर दिये जलायेंगे।।
फिर नई सुबह में नया जोश जीवन फिर से महकेगा।
मेरे इस आँगन में बबली बबुआ फिर से ठुमकेगा।।
रामनारायण सोनी
३०.०५.21